राष्ट्रीय हिंदी कहानी प्रतियोगिता
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मानवता की झलक
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मानवता की झलक
पात्र
1. राजेश (टेंपो चालक)
2. पुलिस अधिकारी
3. अन्य पुलिस कांस्टेबल
( शहर की तंग गलियों व संकरे रास्तो के कारण जगह जगह जाम सा लगा है। स्टेशन के सामने टेंपो, ई-रिक्शा वालों की नजरे सवारियों पर...
पात्र
1. राजेश (टेंपो चालक)
2. पुलिस अधिकारी
3. अन्य पुलिस कांस्टेबल
( शहर की तंग गलियों व संकरे रास्तो के कारण जगह जगह जाम सा लगा है। स्टेशन के सामने टेंपो, ई-रिक्शा वालों की नजरे सवारियों पर...
Storyline
मानवता की झलक
पात्र
1. राजेश (टेंपो चालक)
2. पुलिस अधिकारी
3. अन्य पुलिस कांस्टेबल
( शहर की तंग गलियों व संकरे रास्तो के कारण जगह जगह जाम सा लगा है। स्टेशन के सामने टेंपो, ई-रिक्शा वालों की नजरे सवारियों पर टिकी हैं। राजेश भी सवारी का बेसब्री से इंतजार कर रहा है यही तो एकमात्र जरिया था उसके परिवार का पेट पालने का। आज उसे मां के लिए दवाई भी ले जानी है।तभी कुछ पुलिस कांस्टेबल अपने बड़े साहब के साथ राजेश के पास आएl)
एक कांस्टेबल (रौब से)-थाने चलोगे?
राजेश-जी साहब !
(सभी टेंपो में सवार हो गए और शहर की भीड़भाड़ को चीरता हुआ राजेश का टेंपो आगे बढा। )
राजेश - (मन ही मन) आज की तो कमाई मारी गई ,इनसे तो पैसे माँगना अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना है।
(इसी बीच राजेश का टेंपो थाने के बाहर जाकर रुका, सभी नीचे उतरकर अंदर जाने लगे।राजेश निरीह दृष्टि से उनको देख रहा था,
तभी बड़े साहब के कदम अचानक रुके और वे राजेश की तरफ बढ़े l)
पुलिस अधिकारी- (जेब से 500 का नोट निकाल कर, मुस्कुराते हुए) सभी पुलिसवाले एक से नहीं होते ,ये लो तुम्हारा भाड़ा।
भावावेश में राजेश के मुंह से कुछ निकल ही नहीं पाया उसने चुपचाप रुपये ले लिए और एक बार बड़े साहब की आँखों की तरफ देखा- ' मानवता की झलक उसे साफ नजर आ रही थी।'
प्रेषक- गगन शर्मा
सुभाषनगर अजमेर(राजस्थान)
➡️📱9950013324,8233331276
पात्र
1. राजेश (टेंपो चालक)
2. पुलिस अधिकारी
3. अन्य पुलिस कांस्टेबल
( शहर की तंग गलियों व संकरे रास्तो के कारण जगह जगह जाम सा लगा है। स्टेशन के सामने टेंपो, ई-रिक्शा वालों की नजरे सवारियों पर टिकी हैं। राजेश भी सवारी का बेसब्री से इंतजार कर रहा है यही तो एकमात्र जरिया था उसके परिवार का पेट पालने का। आज उसे मां के लिए दवाई भी ले जानी है।तभी कुछ पुलिस कांस्टेबल अपने बड़े साहब के साथ राजेश के पास आएl)
एक कांस्टेबल (रौब से)-थाने चलोगे?
राजेश-जी साहब !
(सभी टेंपो में सवार हो गए और शहर की भीड़भाड़ को चीरता हुआ राजेश का टेंपो आगे बढा। )
राजेश - (मन ही मन) आज की तो कमाई मारी गई ,इनसे तो पैसे माँगना अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना है।
(इसी बीच राजेश का टेंपो थाने के बाहर जाकर रुका, सभी नीचे उतरकर अंदर जाने लगे।राजेश निरीह दृष्टि से उनको देख रहा था,
तभी बड़े साहब के कदम अचानक रुके और वे राजेश की तरफ बढ़े l)
पुलिस अधिकारी- (जेब से 500 का नोट निकाल कर, मुस्कुराते हुए) सभी पुलिसवाले एक से नहीं होते ,ये लो तुम्हारा भाड़ा।
भावावेश में राजेश के मुंह से कुछ निकल ही नहीं पाया उसने चुपचाप रुपये ले लिए और एक बार बड़े साहब की आँखों की तरफ देखा- ' मानवता की झलक उसे साफ नजर आ रही थी।'
प्रेषक- गगन शर्मा
सुभाषनगर अजमेर(राजस्थान)
➡️📱9950013324,8233331276
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मानवता की झलक
Nov 11, 2025
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