लघुकथा पुस्तक
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मछली की जिजीविषा
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तसले का वह थोड़ा सा पानी अब ज़हर जैसा भारी हो गया था। मछली का हर सांस लेना एक युद्ध जैसा था। गलफड़े फड़फड़ा रहे थे और वह बस हार मानने ही वाली थी कि तभी मछुआरे की आवाज़ उसके कानों में पड़ी-"बाबूजी, इसे ले जाइये, ग्राहक...
Storyline
तसले का वह थोड़ा सा पानी अब ज़हर जैसा भारी हो गया था। मछली का हर सांस लेना एक युद्ध जैसा था। गलफड़े फड़फड़ा रहे थे और वह बस हार मानने ही वाली थी कि तभी मछुआरे की आवाज़ उसके कानों में पड़ी-"बाबूजी, इसे ले जाइये, ग्राहक को 'ज़िंदा' मछली ही भाती है।"
मछली के बुझते हुए प्राणों में जैसे बिजली दौड़ गई। उसे लगा, 'ज़िंदा' होना कितनी बड़ी नियामत है! उसने सोचा कि शायद उसकी ज़िंदगी की कीमत समझ ली गई है। वह अपनी सारी पीड़ा भूलकर पानी में एक बार फिर तैरने लगी, अपनी पूँछ हिलाने लगी। वह उस 'ग्राहक' के लिए खुद को सजाने लगी जो उसे उसके 'जीवन' के कारण पसंद करने वाला था।
ग्राहक आया। उसकी आँखों में मछली के लिए कोई प्रेम नहीं, सिर्फ एक भूख थी। मछली ने अपनी चमकदार आँखों से उसे देखा, जैसे कह रही हो- "देखो, मैं जीवित हूँ, मुझे ले चलो।"
फिर अचानक, एक ठंडी और पैनी आरी उसके जिस्म पर चली। वह जिसे अपना 'जीवन' समझ रही थी, वह तो महज़ 'ताज़गी' का पैमाना था। एक-एक कर उसके शरीर के हिस्से किए गए। खाल उधेड़ दी गई, वे आँखें निकाल ली गईं जिनसे उसने अभी सुनहरी उम्मीद देखी थी। उसका पेट चीरकर उसे अंदर से बिल्कुल खाली कर दिया गया। ग्राहक अपनी 'ताज़ा' खरीद को झोले में डालकर चला गया।
बाज़ार की चहल-पहल कम हुई, तो मैंने देखा... दूर कूड़े के ढेर पर खून से सना उसका छोटा सा दिल पड़ा था। वह अब भी कांप रहा था, अब भी धड़क रहा था।
हैरानी यह थी कि सिर कट गया था, जिस्म के टुकड़े हो चुके थे, लेकिन वह नन्हा सा दिल हार मानने को तैयार न था। धूल और गंदगी के बीच पड़ा वह दिल हर धड़कन के साथ बस एक ही चीख पुकार रहा था-"मुझे थोड़ा और जीना है... मुझे एक बार फिर पानी में जाना है।"**
सब कुछ लुट जाने के बाद भी, वह मछली मरना नहीं चाहती थी। उसकी वह आख़िरी धड़कन मौत से नहीं, बल्कि ज़िंदगी की उस झूठी उम्मीद से लड़ रही थी जो उसे बाज़ार में मिली थी।
मछली के बुझते हुए प्राणों में जैसे बिजली दौड़ गई। उसे लगा, 'ज़िंदा' होना कितनी बड़ी नियामत है! उसने सोचा कि शायद उसकी ज़िंदगी की कीमत समझ ली गई है। वह अपनी सारी पीड़ा भूलकर पानी में एक बार फिर तैरने लगी, अपनी पूँछ हिलाने लगी। वह उस 'ग्राहक' के लिए खुद को सजाने लगी जो उसे उसके 'जीवन' के कारण पसंद करने वाला था।
ग्राहक आया। उसकी आँखों में मछली के लिए कोई प्रेम नहीं, सिर्फ एक भूख थी। मछली ने अपनी चमकदार आँखों से उसे देखा, जैसे कह रही हो- "देखो, मैं जीवित हूँ, मुझे ले चलो।"
फिर अचानक, एक ठंडी और पैनी आरी उसके जिस्म पर चली। वह जिसे अपना 'जीवन' समझ रही थी, वह तो महज़ 'ताज़गी' का पैमाना था। एक-एक कर उसके शरीर के हिस्से किए गए। खाल उधेड़ दी गई, वे आँखें निकाल ली गईं जिनसे उसने अभी सुनहरी उम्मीद देखी थी। उसका पेट चीरकर उसे अंदर से बिल्कुल खाली कर दिया गया। ग्राहक अपनी 'ताज़ा' खरीद को झोले में डालकर चला गया।
बाज़ार की चहल-पहल कम हुई, तो मैंने देखा... दूर कूड़े के ढेर पर खून से सना उसका छोटा सा दिल पड़ा था। वह अब भी कांप रहा था, अब भी धड़क रहा था।
हैरानी यह थी कि सिर कट गया था, जिस्म के टुकड़े हो चुके थे, लेकिन वह नन्हा सा दिल हार मानने को तैयार न था। धूल और गंदगी के बीच पड़ा वह दिल हर धड़कन के साथ बस एक ही चीख पुकार रहा था-"मुझे थोड़ा और जीना है... मुझे एक बार फिर पानी में जाना है।"**
सब कुछ लुट जाने के बाद भी, वह मछली मरना नहीं चाहती थी। उसकी वह आख़िरी धड़कन मौत से नहीं, बल्कि ज़िंदगी की उस झूठी उम्मीद से लड़ रही थी जो उसे बाज़ार में मिली थी।
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