सामाजिक
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निमित्त
★
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Ongoing
कहानी: निमित्त
लेखक: भीष्म साहनी
संक्षिप्त विवरण:
यह कहानी मानवीय नियति, भाग्य और भारत-विभाजन की त्रासदी के बीच बुनी गई एक मर्मस्पर्शी रचना है। कहानी की शुरुआत एक साधारण बैठक में 'भाग्य' और 'दाने-दाने पर मोहर' ...
लेखक: भीष्म साहनी
संक्षिप्त विवरण:
यह कहानी मानवीय नियति, भाग्य और भारत-विभाजन की त्रासदी के बीच बुनी गई एक मर्मस्पर्शी रचना है। कहानी की शुरुआत एक साधारण बैठक में 'भाग्य' और 'दाने-दाने पर मोहर' ...
Storyline
कहानी: निमित्त
लेखक: भीष्म साहनी
संक्षिप्त विवरण:
यह कहानी मानवीय नियति, भाग्य और भारत-विभाजन की त्रासदी के बीच बुनी गई एक मर्मस्पर्शी रचना है। कहानी की शुरुआत एक साधारण बैठक में 'भाग्य' और 'दाने-दाने पर मोहर' जैसे विषयों पर हो रही चर्चा से होती है, जो धीरे-धीरे 1947 के दंगों की एक भयानक याद में बदल जाती है।
कहानी का मुख्य केंद्र एक बुजुर्ग पात्र हैं, जो कट्टर भाग्यवादी हैं। वे सुनाते हैं कि कैसे विभाजन के दौरान उन्होंने अपने पुराने मुस्लिम मिस्त्री, इमामदीन को दंगाइयों से बचाने के लिए 'किस्मत' के भरोसे छोड़ दिया था। जहाँ एक तरफ हिंसक भीड़ जान लेने पर उतारू थी, वहीं दूसरी तरफ ड्राइवर शेरसिंह ने अपनी सूझबूझ और इंसानियत से एक जान बचाई। यह कहानी इस द्वंद्व को उजागर करती है कि क्या सब कुछ पहले से तय है, या संकट के समय मनुष्य का साहस और उसकी करुणा ही असली 'निमित्त' (कारण) बनती है। भीष्म साहनी जी ने बहुत ही खूबसूरती से यह दिखाया है कि नफरत के दौर में भी इंसानियत कैसे जिंदा रहती है।
लेखक: भीष्म साहनी
संक्षिप्त विवरण:
यह कहानी मानवीय नियति, भाग्य और भारत-विभाजन की त्रासदी के बीच बुनी गई एक मर्मस्पर्शी रचना है। कहानी की शुरुआत एक साधारण बैठक में 'भाग्य' और 'दाने-दाने पर मोहर' जैसे विषयों पर हो रही चर्चा से होती है, जो धीरे-धीरे 1947 के दंगों की एक भयानक याद में बदल जाती है।
कहानी का मुख्य केंद्र एक बुजुर्ग पात्र हैं, जो कट्टर भाग्यवादी हैं। वे सुनाते हैं कि कैसे विभाजन के दौरान उन्होंने अपने पुराने मुस्लिम मिस्त्री, इमामदीन को दंगाइयों से बचाने के लिए 'किस्मत' के भरोसे छोड़ दिया था। जहाँ एक तरफ हिंसक भीड़ जान लेने पर उतारू थी, वहीं दूसरी तरफ ड्राइवर शेरसिंह ने अपनी सूझबूझ और इंसानियत से एक जान बचाई। यह कहानी इस द्वंद्व को उजागर करती है कि क्या सब कुछ पहले से तय है, या संकट के समय मनुष्य का साहस और उसकी करुणा ही असली 'निमित्त' (कारण) बनती है। भीष्म साहनी जी ने बहुत ही खूबसूरती से यह दिखाया है कि नफरत के दौर में भी इंसानियत कैसे जिंदा रहती है।
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