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हमीद  2.0
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हमीद 2.0

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ईदी के कुल तीन पैसे हाथ में थामे हामिद मेले की भीड़ में सिर्फ़ एक ही तलाश में था-दादी के लिए लोहे का एक मज़बूत चिमटा। तवे से रोटियाँ उतारते वक्त दादी की जलती हुई उंगलियाँ और उनके चेहरे की बेबसी उसे दिन-रात बेचैन किए रहती...

Storyline

ईदी के कुल तीन पैसे हाथ में थामे हामिद मेले की भीड़ में सिर्फ़ एक ही तलाश में था-दादी के लिए लोहे का एक मज़बूत चिमटा। तवे से रोटियाँ उतारते वक्त दादी की जलती हुई उंगलियाँ और उनके चेहरे की बेबसी उसे दिन-रात बेचैन किए रहती थी। वह बचपन की निश्छलता और ममता के धागे से बंधा, बस अपनी अमीना दादी का दर्द कम करना चाहता था। तभी मेले की एक दुकान पर उसकी नज़र अपने दोस्त अब्दुल पर पड़ी। अब्दुल एक कसाई की दुकान से एक बड़ा, धारदार और चमचमाता हुआ चाकू खरीद रहा था। हामिद ने मासूमियत से टोक दिया, "अब्दुल, इतना बड़ा चाकू किस लिए?" अब्दुल की आँखों में एक अजीब सी चमक उभरी। वह कुटिलता से हँस पड़ा और बोला, "बोटी काटने को... अब ये मत पूछना कि किसकी बोटी!" हामिद का मासूम दिल उस हँसी के पीछे छिपे तीखेपन को समझ न पाया। हामिद उलझे कदमों से और आगे बढ़ा, तो उसकी निगाहें सलीम पर टिक गईं। सलीम, जो कुछ दिनों पहले तक फटेहाली में ई-रिक्शा चलाता था, आज एक महँगी, चमचमाती स्पोर्ट्स बाइक पर बैठा था। बदन पर कीमती कपड़े थे और आँखों पर काला चश्मा। हामिद से रहा नहीं गया, वह पास जाकर बोला, "ओए सलीम! इतने पैसे किधर से आ गए तेरे पास? तू तो वही है न, जिसे कई बार भूखा देख मेरी दादी ने अपने हिस्से की रोटियाँ दे दी थीं?" सलीम ने चश्मा नीचे सरकाया और ठसके से हँसा, "तू अभी नादान है हामिद, दुनियादारी नहीं समझता। मैंने एक 'काफ़िर' की लौंडिया को अपने जाल में फंसा लिया है। ये जो ऐश-ओ-आराम देख रहा है न, ये सब उसी 'काम' को अंजाम देने का इनाम है।" हामिद के नन्हे दिमाग़ पर एक और गहरा झटका लगा। असमंजस में डूबा, अपना सर खुजाता हुआ हामिद जैसे ही आगे बढ़ा, सामने से जावेद आता दिखा। जावेद वही था, जो पिछले महीने ही सरेआम जेब काटते पकड़ा गया था और जेल की सलाखों के पीछे था। हामिद ने चौंककर पूछा, "जावेद! तू जेल से कब छूटा भाई?" जावेद ने अपनी आस्तीन चढ़ाई और गर्व से सीना फुलाकर बोला, "बड़े इमाम साहब ने रहम कर के जमानत करवा दी। और सुन, अब मैं छोटी-मोटी जेबें नहीं काटता... अब सीधे गले काटने का हुनर सीख रहा हूँ। 'दीन की ख़िदमत' का काम जो मिल गया है!" हामिद सन्न रह गया। चारों तरफ़ ढोल-नगाड़े, खिलौने और मिठाइयों से सजी उस रंगीन मेले की भीड़ में वह खुद को बिलकुल अकेला और ठगा हुआ महसूस कर रहा था। उसकी मासूमियत की परतें एक-एक कर उखड़ चुकी थीं। सामने लोहार की दुकान पर वही चिमटा रखा था, जिसे लेने वह आया था। हामिद ने एक कदम दुकान की तरफ़ बढ़ाया... कुछ पल चिमटे को निहारा, और फिर अचानक उसके कदम ठिठक गए। उसने चिमटे से नफरत भरी नज़रें फेरीं और

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