सामाजिक
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भाग्य रेखा भीष्म साहनी ।
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भाग्य-रेखा: कहानी का सारांश
भीष्म साहनी की यह कहानी दिल्ली के कनाट प्लेस के एक पार्क में शुरू होती है। इसके मुख्य पात्र दो लाचार इंसान हैं—एक बीमार मजदूर जिसकी उंगलियाँ मशीन में कट चुकी हैं, और दूसरा एक गरीब युव...
भीष्म साहनी की यह कहानी दिल्ली के कनाट प्लेस के एक पार्क में शुरू होती है। इसके मुख्य पात्र दो लाचार इंसान हैं—एक बीमार मजदूर जिसकी उंगलियाँ मशीन में कट चुकी हैं, और दूसरा एक गरीब युव...
Storyline
भाग्य-रेखा: कहानी का सारांश
भीष्म साहनी की यह कहानी दिल्ली के कनाट प्लेस के एक पार्क में शुरू होती है। इसके मुख्य पात्र दो लाचार इंसान हैं—एक बीमार मजदूर जिसकी उंगलियाँ मशीन में कट चुकी हैं, और दूसरा एक गरीब युवा ज्योतिषी।
मजदूर जब ज्योतिषी को अपना हाथ दिखाता है, तो ज्योतिषी उसे धन मिलने का झूठा दिलासा देता है। हताश और भूखा मजदूर उसे थप्पड़ मार देता है, क्योंकि उसे 'सुनहरे भविष्य' पर यकीन नहीं है। अंततः ज्योतिषी स्वीकार करता है कि मजदूर के हाथ में भाग्य-रेखा है ही नहीं। वहीं, ज्योतिषी के हाथ में लंबी भाग्य-रेखा होने के बावजूद वह खुद भी गरीबी में जी रहा है। लेखक यहाँ दिखाते हैं कि गरीबी में 'भाग्य' और 'किस्मत' जैसे शब्द बेमानी हैं।
कहानी का अंत तब बदलता है जब मई दिवस का एक विशाल मजदूर जुलूस वहां से गुजरता है। हजारों मजदूरों की एकता और उनके नारों की गूँज देखकर बीमार मजदूर में एक नई ऊर्जा भर जाती है। उसे समझ आता है कि अकेले इंसान का भाग्य भले ही कुछ न हो, लेकिन सामूहिक शक्ति से इतिहास बदला जा सकता है। वह अपनी कटी उंगलियों वाली हथेली दिखाकर कहता है कि अब उसकी भाग्य-रेखा कमजोर नहीं है।
भीष्म साहनी की यह कहानी दिल्ली के कनाट प्लेस के एक पार्क में शुरू होती है। इसके मुख्य पात्र दो लाचार इंसान हैं—एक बीमार मजदूर जिसकी उंगलियाँ मशीन में कट चुकी हैं, और दूसरा एक गरीब युवा ज्योतिषी।
मजदूर जब ज्योतिषी को अपना हाथ दिखाता है, तो ज्योतिषी उसे धन मिलने का झूठा दिलासा देता है। हताश और भूखा मजदूर उसे थप्पड़ मार देता है, क्योंकि उसे 'सुनहरे भविष्य' पर यकीन नहीं है। अंततः ज्योतिषी स्वीकार करता है कि मजदूर के हाथ में भाग्य-रेखा है ही नहीं। वहीं, ज्योतिषी के हाथ में लंबी भाग्य-रेखा होने के बावजूद वह खुद भी गरीबी में जी रहा है। लेखक यहाँ दिखाते हैं कि गरीबी में 'भाग्य' और 'किस्मत' जैसे शब्द बेमानी हैं।
कहानी का अंत तब बदलता है जब मई दिवस का एक विशाल मजदूर जुलूस वहां से गुजरता है। हजारों मजदूरों की एकता और उनके नारों की गूँज देखकर बीमार मजदूर में एक नई ऊर्जा भर जाती है। उसे समझ आता है कि अकेले इंसान का भाग्य भले ही कुछ न हो, लेकिन सामूहिक शक्ति से इतिहास बदला जा सकता है। वह अपनी कटी उंगलियों वाली हथेली दिखाकर कहता है कि अब उसकी भाग्य-रेखा कमजोर नहीं है।
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Chapter 1
भाग्य रेखा - Chapter 1
Jan 29, 2026
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