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एक खता

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सब्जियां खरीद कर जैसे ही पलटी "वो" सामने खड़ी थी। कुछ देर लगी पहचानने में, वर्ष भी तो बहुत बीत चुके थे। फिर अचानक ही मुंह से निकला "सुनंदा",,,, तुम सुनंदा हो ना। वो मुस्कुरा दी, वो पहले ही मुझे पहचान चुकी थी। वजह जाहि...

Storyline

सब्जियां खरीद कर जैसे ही पलटी "वो" सामने खड़ी थी। कुछ देर लगी पहचानने में, वर्ष भी तो बहुत बीत चुके थे। फिर अचानक ही मुंह से निकला "सुनंदा",,,, तुम सुनंदा हो ना। वो मुस्कुरा दी, वो पहले ही मुझे पहचान चुकी थी। वजह जाहिर है कि मैं बहुत ज्यादा नहीं बदली थी मगर वो बहुत बदल चुकी थी। लंबी चोटियों की जगह स्टाइल में कंधे तक कटे बालों ने ले ली थी, क्षीण कटि की जगह स्थूल घेरे ने ले ली थी। हमेशा व्यवस्थित रहने वाली सुनंदा की साड़ी तक अस्त व्यस्त थी जबकि वो बहुमूल्य साड़ी थी। हाथों में हीरे की अंगूठी, सोने की चूडियाँ, कानों में भी हीरे के ही कर्णफूल,,कंधे पर लटकता महंगा लेदर का पर्स उसके वैभव का परिचय स्वत: ही दे रहे थे। मुझे अजीब से संकोच ने घेर लिया। थोड़ी देर पहले ही मोची ने पांचवी बार मेरी चप्पलों पर अपनी कशीदाकारी करते हुए कुछ व्यंग्य से ही कहा था कि "बहूरानी, अब दूसरी ले लो,,इसमें और गुंजाइश नहीं है"। मैंने सूती सस्ती साड़ी के फटे हुए फॉल को और नीचे खींचकर चप्पलों को ढ़कने की चेष्टा की। हाथ के थैली को पीछे कर लिया जिसमें लड़ झगड़कर सस्ती कराई हुई कुछ सब्जियां थीं जो थैली में थीं भी या नहीं पता नहीं चल रहा था। मगर सुनंदा का ध्यान इन चीजों पर बिल्कुल नहीं था। वो बस मुझे देखे जा रही थी। अत्यंत प्रेम से जैसे कोई खोई हुई प्रिय वस्तु को पुनः प्राप्त करके देखता है। मुझे, अपनी बचपन की सहेली को। हमने स्कूल साथ में किया, एक ही मोहल्ले में रहते थे, एक स्कूल, एक रिक्शा, एक ही क्लास। फिर कॉलेज में भी साथ एडमिशन लिए मगर उसके पापा का प्रमोशन हुआ और दूसरे शहर में ट्रांसफर भी। वो चली गई अपने परिवार के साथ। कुछ सालों तक उसके पत्र आते रहे। जहां उसके पापा की जॉब थी वहां से 32 किलोमीटर दूर कॉलेज में उसने एडमिशन लिया था और रोज जाने आने की भागदौड़ से बचने के लिए हॉस्टल में ही रहती थी। शनिवार को घर आती और सोमवार सुबह लौट जाती। । एक चिट्ठी में लिखा था उसने कि हॉस्टल में "नेहा" उसकी रूममेट थी और वो बहुत ही अच्छी खुशमिजाज लड़की थी। फिर तीन चार पत्र जो मिले उसमें सिर्फ नेहा की बातें होती थीं। सुनंदा के बताये ही पता चलता था कि नेहा सुनंदा के जीवन का अभिन्न अंग बन गयी है। फिर धीरे धीरे चिट्ठियां आनी कम हो गयीं, मैं लिखती तो कभी चार लाइन का जवाब आता और कभी नहीं। वो चार लाइनें भी बेमन से लिखी हुईं। इतना पता चला कि कि सुमित नाम का एक लड़का सुनंदा के जीवन में आ चुका था मगर वो कुछ खास बताना नहीं चाहती थी उसके विषय में। कोई भी रिश्ता एकतरफा नहीं निभ सकता इसलिए मैने भी चिट्ठी लिखना बंद कर दिया। फिर सुनाई पड़ा कि सुमित से सुनंदा की शादी हो रही है। हमारे घर निमंत्रण पत्र भी आया था मगर उसी समय मेरी बुआ के बेटे की शादी होने की वजह से कोई

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