कहानी पुस्तक
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तुम मेरे आगे खड़ीं थीं
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हम साधारणतया अपने इर्दगिर्द के समाज को सुधारने का दावा तो जरूर करते हैं, परंतु उस समाज में फैली हुई कुरीतियों और सड़ी गली परंपराओं का विरोध कदापि नहीं करते। उलटे तस्वीर कुछ ऐसी बन चुकी है हमारे दिलोदिमाग़ की कि हम कर...
Storyline
हम साधारणतया अपने इर्दगिर्द के समाज को सुधारने का दावा तो जरूर करते हैं, परंतु उस समाज में फैली हुई कुरीतियों और सड़ी गली परंपराओं का विरोध कदापि नहीं करते। उलटे तस्वीर कुछ ऐसी बन चुकी है हमारे दिलोदिमाग़ की कि हम करना कुछ चाहते हैं और कर कुछ और ही जातें हैं। संभवतः हम समाज के दंभी ठेकेदारों से भय खातें हैं। और तो और हम सभी भी कभी कभार जाने अनजाने में भेड़ चाल चलकर उन सभी बुराइयों का समर्थन करने लगते हैं। तो आप ही सभी बताइए कि बेहतर समाज का निर्माण कैसे संभव होगा ?
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