राष्ट्रीय हिंदी कहानी प्रतियोगिता
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लघुकथा मुक्ति
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लघुकथा : मुक्ति
आज बहू को शांत हुए दो माह हो गये और यह क्या ! बिटिया को भी इतनी जल्दी क्या पड़ी थी मां के पास जाने की। जाना मेरे को था लेकिन भगवान तुमने ये कैसा अनर्थ कर डाला। अब क्या होगा मेरे रज्जन का, कैसे रहेग...
आज बहू को शांत हुए दो माह हो गये और यह क्या ! बिटिया को भी इतनी जल्दी क्या पड़ी थी मां के पास जाने की। जाना मेरे को था लेकिन भगवान तुमने ये कैसा अनर्थ कर डाला। अब क्या होगा मेरे रज्जन का, कैसे रहेग...
Storyline
लघुकथा : मुक्ति
आज बहू को शांत हुए दो माह हो गये और यह क्या ! बिटिया को भी इतनी जल्दी क्या पड़ी थी मां के पास जाने की। जाना मेरे को था लेकिन भगवान तुमने ये कैसा अनर्थ कर डाला। अब क्या होगा मेरे रज्जन का, कैसे रहेगे मेरे डब्बू, शैलू और रिंकी। यह उस मां का, उस दादी मां का दर्द था जिसने अपनी प्यारी बहू मणि और नातिन संगीता को दो माह के अंतराल से खो दिया था। बहू की फोटो देखते देखते वह पुरानी यादों में खो गई और उसके आसु बहने लगे। पहले जहा वह साल छह माह में अपने बेटे रज्जन से मिलने चली आया करती थी अब हर दो माह में आ जाती है। वह समझ सकती है कि उसका बेटा अपनी पत्नी के बगैर नही रह सकता और तीनो मासूम नाती कैसे रह पायेंगे उस खाली घर में, जिसका नाम तो " सिद्ध भवन" था लेकिन उसने सारे परिवार का असिद्ध कर दिया था । बहुत कुछ खोया था उस वृद्धा ने, छोटी उम्र में शादी हो जाने के बाद पहले मां बाप को, फिर अपने सगे भाई को, पति को और बेटे को , लेकिन बहू और युवा नातिन के असमय जाने से वे हर तरह से टूट गई थी। दिन भर जाप करती रहती , बहू के गुणों को याद करती हुई अंततः एक दिन सबसे मिलने के लिए चल बसी।
डाक्टर संदीप नारद
260 AA, तुलसी नगर
सरस्वती मंदिर के पास
इंदौर
आज बहू को शांत हुए दो माह हो गये और यह क्या ! बिटिया को भी इतनी जल्दी क्या पड़ी थी मां के पास जाने की। जाना मेरे को था लेकिन भगवान तुमने ये कैसा अनर्थ कर डाला। अब क्या होगा मेरे रज्जन का, कैसे रहेगे मेरे डब्बू, शैलू और रिंकी। यह उस मां का, उस दादी मां का दर्द था जिसने अपनी प्यारी बहू मणि और नातिन संगीता को दो माह के अंतराल से खो दिया था। बहू की फोटो देखते देखते वह पुरानी यादों में खो गई और उसके आसु बहने लगे। पहले जहा वह साल छह माह में अपने बेटे रज्जन से मिलने चली आया करती थी अब हर दो माह में आ जाती है। वह समझ सकती है कि उसका बेटा अपनी पत्नी के बगैर नही रह सकता और तीनो मासूम नाती कैसे रह पायेंगे उस खाली घर में, जिसका नाम तो " सिद्ध भवन" था लेकिन उसने सारे परिवार का असिद्ध कर दिया था । बहुत कुछ खोया था उस वृद्धा ने, छोटी उम्र में शादी हो जाने के बाद पहले मां बाप को, फिर अपने सगे भाई को, पति को और बेटे को , लेकिन बहू और युवा नातिन के असमय जाने से वे हर तरह से टूट गई थी। दिन भर जाप करती रहती , बहू के गुणों को याद करती हुई अंततः एक दिन सबसे मिलने के लिए चल बसी।
डाक्टर संदीप नारद
260 AA, तुलसी नगर
सरस्वती मंदिर के पास
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लघुकथा मुक्ति
Nov 11, 2025
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