काव्य पुस्तक
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पावस घन सी
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बाबुल की चौखट पर बचपन छोड़
ससुराल की दहलीज़ से अर्थी चढ़ती है
पावस घन सी बरसते बिखरती
ख़ुमारी भर आंखों में
उम्र का हर पड़ाव पार करती है
परिवार की सीमा बन सागर सी सहजती
अपनों की पीड़ा पीठ पर लादें
एक जीवन में...
ससुराल की दहलीज़ से अर्थी चढ़ती है
पावस घन सी बरसते बिखरती
ख़ुमारी भर आंखों में
उम्र का हर पड़ाव पार करती है
परिवार की सीमा बन सागर सी सहजती
अपनों की पीड़ा पीठ पर लादें
एक जीवन में...
Storyline
बाबुल की चौखट पर बचपन छोड़
ससुराल की दहलीज़ से अर्थी चढ़ती है
पावस घन सी बरसते बिखरती
ख़ुमारी भर आंखों में
उम्र का हर पड़ाव पार करती है
परिवार की सीमा बन सागर सी सहजती
अपनों की पीड़ा पीठ पर लादें
एक जीवन में सौ स्वर्ग रच लेती है
श्वास समीर दें प्रतिदान में
आलोक सजाते आयु खर्च कर देती है
भोर की बेला रश्मि वलय संग आंखें खोले
कुसुमित उपवन अपना देखकर
खुशियों की बौछार से
नयन में नीर मीठे भर लेती है
अधिर नहीं, न उतावली सी
मिटने की अधिकारी बावली
करुणा का उपहार अपनों पर वार देती है
हौले-हौले चाॅंद की भाॅंती घटती-घटती
उफ़्फ कहाॅं करती है?
उड़ते ही श्वास उर से तृषित जीवन की
डोर काटते दर्पण मृत्यु का देख लेती है
करना स्पर्श कभी प्यार से देहरी को
आशीष देती आवाज़ उठेगी
जाकर भी कहां जाती है जग से
घर की धुरी देहरी पर अपने पैरों के
निशान छोड़ जाती है।
ससुराल की दहलीज़ से अर्थी चढ़ती है
पावस घन सी बरसते बिखरती
ख़ुमारी भर आंखों में
उम्र का हर पड़ाव पार करती है
परिवार की सीमा बन सागर सी सहजती
अपनों की पीड़ा पीठ पर लादें
एक जीवन में सौ स्वर्ग रच लेती है
श्वास समीर दें प्रतिदान में
आलोक सजाते आयु खर्च कर देती है
भोर की बेला रश्मि वलय संग आंखें खोले
कुसुमित उपवन अपना देखकर
खुशियों की बौछार से
नयन में नीर मीठे भर लेती है
अधिर नहीं, न उतावली सी
मिटने की अधिकारी बावली
करुणा का उपहार अपनों पर वार देती है
हौले-हौले चाॅंद की भाॅंती घटती-घटती
उफ़्फ कहाॅं करती है?
उड़ते ही श्वास उर से तृषित जीवन की
डोर काटते दर्पण मृत्यु का देख लेती है
करना स्पर्श कभी प्यार से देहरी को
आशीष देती आवाज़ उठेगी
जाकर भी कहां जाती है जग से
घर की धुरी देहरी पर अपने पैरों के
निशान छोड़ जाती है।
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पावस घन सी
Nov 11, 2025
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