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काव्य पुस्तक
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ज़िन्दगी में ज़िन्दगी कहाँ

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ज़िन्दगी में ज़िन्दगी कहाॅं'
यादों के दरिचों में
अपनों की महक कहाॅं
यंत्रवत है सारा जहाॅं
भरे-पूरे आलय में भी
रिश्तों की रौनक कहाॅं
दूर सुदूर मकान ही मकान
घर नहीं एक भी यहाॅं
पगडंडियाॅं सूनी पड़ी
पक्की स...
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Storyline

ज़िन्दगी में ज़िन्दगी कहाॅं'
यादों के दरिचों में
अपनों की महक कहाॅं
यंत्रवत है सारा जहाॅं
भरे-पूरे आलय में भी
रिश्तों की रौनक कहाॅं
दूर सुदूर मकान ही मकान
घर नहीं एक भी यहाॅं
पगडंडियाॅं सूनी पड़ी
पक्की सड़कों पे भीड़ भारी
शहर में तब्दील हुए गाॅंव जहाॅं
न पिट्ठू के पत्थर दिखते हैं
न कंचे की खनखन
सूनी-सूनी गलियों में
न किलकारी न शोर यहाॅं
वो कागज़ की कश्ती
वो बुढ़ी के बाल
वो त्योहार का इंतज़ार
वो जश्न सी ज़िंदगी गई कहाॅं
न प्रेमी की राह तकना
न खतों का दौर रहा
स्वार्थ पोती दुनिया में
परवाह न स्नेह रहा
छोटे से पटल में
सिमट गया सारा जहाॅं
कट रही है सबकी यहाॅं
ख़्वाहिशों में ललक कहाॅं
इंसाॅं यहाॅं दौड़ रहा
मंज़िल न कोई लक्ष्य यहाॅं
खड़ी-खड़ी हॅंसती है
कदम-कदम पे मौत यहाॅं
साॅंस सभी ले रहे पर
ज़िन्दगी में ज़िन्दगी कहाॅं
ज़िन्दगी में ज़िन्दगी कहा।

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ज़िन्दगी में ज़िन्दगी कहाँ
Nov 11, 2025
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