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गीली पलकें
काव्य पुस्तक
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गीली पलकें

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रहने दो पल्लू को लहराता, brमत ड़ालो कमर के घोंसले में पसीना पीता सिकुड़ जाएगा, brलगता है जैसे शहर के हर रास्ते समा गए हो दौड़ कर आकर तुम्हारी कमर के आसपास.! br brवो हस्त मिलाप की मखमली छुअन आज छोटे गाँव की पगडंडीयो...
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Storyline

रहने दो पल्लू को लहराता, brमत ड़ालो कमर के घोंसले में पसीना पीता सिकुड़ जाएगा, brलगता है जैसे शहर के हर रास्ते समा गए हो दौड़ कर आकर तुम्हारी कमर के आसपास.! br brवो हस्त मिलाप की मखमली छुअन आज छोटे गाँव की पगडंडीयों सी खुरदुरी लग रही है, हाथ में हाथ दो चुम्बन की मोहर से महका दूँ , कहो कैसा लगा? br brथकान से निढ़ाल अर्धध्वस्त सी तुम बस मेरे पहलू में बैठकर मेरी बेतहाशा चाहत में ढूँढो सुकून के पल, brबिखरे जुड़े में बेमिसाल लगती हो, brआओ तुम्हारे बिखरे जुड़े से चुनकर जिम्मेदारीयों के कण पिरो लूँ मैं अपनी हथेलियों की लकीरों में.! br brपूरे घर के कोने-कोने से आकर जो बस गई है तुम्हारे रोम-रोम में, मरी, मसाले फ़िनाइल, साबुन की brये जो आती है खुशबू तुम्हारे बदन से नासिका को बहका रही है, brमैं ऋणी हूँ तुम्हारा brतुमने अपने पसीने से जो सिंचा है मेरे घर की नींव को.! br brआओ आज सोख लूँ तुम्हारे तन से वो पसीना तुम्हारी पीठ से चुनकर जिम्मेदारीयों के ज़ख्मो को गले लगा लूँ, brमरहम लगाने दो मेरे लबों की खुशबू से, brतुम ठंडी फूँक की सरसराहट में बह जाओ, brपलकें मूँदे करवटों को भूलकर मेरे सीने पर सर रखकर सो जाओ.! br brआधी रात को ये खुशी के आँसू से सजा गिलाफ़ हंसता क्यूँ है ? br brओह काश की ये सपना सुबह का होता सुना है सुबह के सपने सच होते है..!!! br brदूर-दूर बिस्तर के उस छोर से बेफ़िक्री के खर्राटों के शोर में दब गए है सुखद सपने के एहसास, brगीली बोझिल पलकें ताना देते मुस्कुरा रही है।

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गीली पलकें
Nov 11, 2025
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