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कनेर सी
काव्य पुस्तक
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कनेर सी

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कनेर के फूल सी कोमलांगी क्या तुम्हे पता है?
किसी ग्वालन ने सादगी से किए हुए श्रृंगार सी हो तुम
नृत्य को तरसते रिक्त हृदय का द्वार हो
या किसी कविता संग्रह में गढ़े गए उपमानों का सार हो
बोलो न.! तुम बस बोलती जाओ
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Storyline

कनेर के फूल सी कोमलांगी क्या तुम्हे पता है?
किसी ग्वालन ने सादगी से किए हुए श्रृंगार सी हो तुम
नृत्य को तरसते रिक्त हृदय का द्वार हो
या किसी कविता संग्रह में गढ़े गए उपमानों का सार हो
बोलो न.! तुम बस बोलती जाओ
प्रेमरत जोड़े के उर से उठती अनुभूतियों का निनाद हो
तुम्हें सुनना मतलब शंखनाद श्रवण करना
दो धड़क के बीच थमता उच्छ्वास हो तुम
मौन की क्षितिज पर गतिमान उस रिश्ते का अभिमान हो
जो सालों से बेनाम सा एक ही लय में चलायमान हो
मन करता है तुम्हें देखता जाऊँ बिना पलक झपके
सामाजिक हर बंधन तोड़कर बाँहों में तेरी समा जाऊँ
तुम बाहर हो जितनी उससे कई गुना मेरे भीतर हो
तुम उस उर्जा का अंश हो जो बसती है दैवीय दयारों में
जब-जब तुम पलकें उठाती हो तुम्हारी आँखों में
स्वयं को पाता हूँ,
तभी तो कभी-कभार लगता है तुम मेरा ही अक्स हो
नहीं जानती तुम किसी प्रेमकथा की नायिका का
पारदर्शी प्रतिबिम्ब हो
या मंदिरों पर विराजमान ध्वजओं पर अंकित
स्वस्ति चिन्हों का अर्क हो
देखा है तुमने कभी गौर से अपने आपको?
भानु जिस पृथ्वी का परिभ्रमण करता है
उस संघर्ष का प्रतिफल हो
या हो रजनी को रोशन करते चाँद के नूर का टुकड़ा
ऐसे ही नतमस्तक नहीं होता वजूद मेरा तुम्हारे आगे
सन्मुख आते ही माँ दुर्गा का स्वरूप लेती हो
कहो कौन हो तुम कौमुदी
कायनात पर फैली हर शै की रानाइयाँ सी
तुम मुझे बेहद पसंद हो
तुम रुप का सागर, तुम सौंदर्य की गागर
अनुमति हो तो मैं खुद को तुम्हारे नाम करना चाहता हूँ
हमदोनों का युग्मन देख धरती की सारी नदियों का रंग
सुर्ख हो जाएगा, जीवन उत्सव बन जाएंगे
ऋतुएं रंगीन हो जाएगी, सतपुड़ा के सघन वन में
जूही खिल जाएगी
एक बार अपनी हथेली आगे कर दो ज़िन्दगी सँवर जाएगी
मैं जानता हूँ तुम्हारी अनामिका में
प्रेम की एक सुंदर नगरी बसती है।

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