सामाजिक
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"सम्राट"
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अंधेरी रात का दूसरा पहर,अंदर बाहर दोनों तरफ गहन सन्नाटा, सन्नाटे को चीरती रेलगाड़ी की आवाजें , कुछ लोग सीटों पर पूरी तरहं सोए हुए थे, कुछ अधलेटे से सोए हुए थे। बेटे को गोद में सुलाए एक सीट पर थोड़ी सी जगह पर डरी सी बै...
Storyline
अंधेरी रात का दूसरा पहर,अंदर बाहर दोनों तरफ गहन सन्नाटा, सन्नाटे को चीरती रेलगाड़ी की आवाजें , कुछ लोग सीटों पर पूरी तरहं सोए हुए थे, कुछ अधलेटे से सोए हुए थे। बेटे को गोद में सुलाए एक सीट पर थोड़ी सी जगह पर डरी सी बैठी थी सुरेखा। उसके पैरों के पास ही तेरह चौदह साल का पूरन बहादुर तोलिया बिछाकर लेटा था, शायद सो गया था।पूरे डिब्बे में सिर्फ सुरेखा ही जग रही थी।बाकी सब निंद्रा रानी के आगोश में थे। उसकी आंखों में आज नींद ही नहीं थी,था तो सिर्फ डर, बिना टिकट का सफर , किसी भी पल चैंकिंग हो गई तो? हर हल्की सी आहट पर चौंक जाती थी।कलाई पर बंधी एक मटमैले से घिसे हुए काले फीते की घड़ी की तरफ नजर डाली तो सुईयां चल रही थी। रात के ढाई बज चुके थे। पता नहीं क्यों आज सुरेखा को वक्त की रफ्तार थोड़ी धीमी लग रही थी,पर मां तो कहती थी वक्त कभी किसी के लिए नहीं थमता, शायद थम ही जाता होगा,जब उसे किसी का तमाशा देखना हो तो। तमाशा ही तो बन गई है वो,कभी सोचा भी ना था कि ज़िंदगी यूं सड़क पर ले आयेगी। सड़क पर ही तो पहुंच ग ई थी,वो भी बड़े बड़े सवालिया निशानों की निगरानी में। काश , कक्षा के हर सवालों की तरहं ज़िंदगी के सवालों का भी जवाब होता उस के पास। ज़िंदगी के सवाल तो गणित के सवालों से भी ज्यादा मुश्किल होते हैं। मुश्किल लगने वाले गणित के सवालों को वो उदाहरण देख देख के हल करने की कोशिश करती थी।क ई बार हो भी जाते थे,पर कई बार कुंजी में से देख कर हल कर लेती थी। ऐसी कोई कुंजी उसे अभी तक तो नहीं मिली थी जो ज़िंदगी की मुश्किलें सुलझा कर जवाब सुझा दे। अपनी ही उधड़बुन में खोई सी वो बहुत परेशान सी बैठी थी ,एक तो सीट के कोने पर थोड़ी सी जगह,ऊपर से गोदी में बेटा,दो घंटे बीत चुके थे।उसका मन कर रहा था सोए हुए पूरन की बगल में आराम से जाकर बैठ जाएं,पर ये भी मुमकिन नहीं था,सब लोगों के पैर लटके थे वहां,और फिर, नहीं नहीं मैं ठीक हूं,और फिर सफर ही कितना बकाया बचा है, सारा तो बीत ही गया लगभग,अब चंद मिनटों की ही तो बात है।एक बार मन किया कि बेटे को कुछ पल कंधे से लगा लूं, शायद टांगों को थोड़ा आराम मिले,पर इतनी कच्ची नींद है इसकी तुंरत उठ जायेगा । तभी उसे लगा था की ट्रेन की रफ्तार थोड़ी धीमी पड़ने लगी है।धीमी पड़ती रफ्तार ने उसके दिलों दिमाग की बेचैनी और डर को बढ़ा दिया था। धीमी रफ़्तार के साथ ही उसने थोड़ा झुक कर नीचे सोए लड़के को थोड़ा हिलाया था "बहादुर," उसके होंठ बुदबुदाए थे। "जी दीदी, अपना शहर आ गया क्या?" "सुरेखा ने हल्के से गर्दन हिला दी थी।" पूरन आंखें मलता हुआ उठ बैठा था एक सिपाही की तरह,कोने में टंगे दोनों बैग उतार कर अपने कांधे पर लटका लिए थे उसने। तब तक ट्रेन भी थम गई थी,रेलवे स्टेशन पर
What Readers Say
View Allमुकेश दुहन मुकू
6 months ago
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मुकेश दुहन मुकू
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anuj
6 months ago
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मुकेश दुहन मुकू
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anuj
अच्छी शुरुआत
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