काव्य पुस्तक
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सुनों सुखनवरों
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सुनों सुखनवरों ..विफल हो तुम
बहुत लिखते हो प्यार, इश्क, मोहब्बत के अफ़साने
लिखी क्या तुमने
पर्वतमाला की देह पर उभर आए नहोर की दास्ताँ,
या रेशमी बदन को नोंचकर बेल पर छूटकर
घूम रहे पाशवी मनोरोगी का इतराना ...
बहुत लिखते हो प्यार, इश्क, मोहब्बत के अफ़साने
लिखी क्या तुमने
पर्वतमाला की देह पर उभर आए नहोर की दास्ताँ,
या रेशमी बदन को नोंचकर बेल पर छूटकर
घूम रहे पाशवी मनोरोगी का इतराना ...
Storyline
सुनों सुखनवरों ..विफल हो तुम
बहुत लिखते हो प्यार, इश्क, मोहब्बत के अफ़साने
लिखी क्या तुमने
पर्वतमाला की देह पर उभर आए नहोर की दास्ताँ,
या रेशमी बदन को नोंचकर बेल पर छूटकर
घूम रहे पाशवी मनोरोगी का इतराना लिखा
क्या लिखे तुमने बच्चियों के कोमल देह पर रेंगकर
मारकर फेंकने वाले जल्लादों के कारनामें
प्रेम के कूप से मेढ़क सी छलांग लगाकर निकलो बाहर
सो रहे समाज को खरापन का आईना दिखाना होगा
विस्मृत तिथि न बन जाए वारदातें
खोलने को राज़ बेहद पड़े है, पर्दा उठाने की कोशिश तो करो
माना कि समुन्दर गहरा है कश्ती उतारनी होगी
गोते लगाकर घटनाओं को तार-तार कर दो
कलम को शमशीर का रुप देकर
बिच्छुओं का ज़हर स्याही की जगह भर लो
जागो न.. केवल प्रेम में क्या रखा है
अल्फ़ाज़ों की कंटिली ऐसी बारिश हो जाए कि,
कसमसाने लगे कविताएं और खोखली कानून व्यवस्था
टूटकर ढ़ेर हो जाए
तीखे डंक की त्सुनामी सृजनता में भरकर निर्भिक बन घेर लो
कलम दंड दिला सकती है हर अनैतिकता को
कड़ापन होना चाहिए तसव्वुर के कण-कण में
गहरा मौन अभिव्यक्ति की मौत है
अल्फ़ाज़ों के ज़रिए चिल्लाओ, और ज़ोर से चिल्लाओ
चिल्ला-चिल्लाकर अदालत को व्यग्र कर दो
समाज में फैली बदी को चुनौती दो
क्यों लिखना है ऐसा जिसमें समाज का उद्धार न हो
शब्दों में अमृत सींचकर कलम को मृत होने से बचा लो
क्यों जीना है ऐसे शरीर के साथ जिसमें आत्मा का वास न हो।
बहुत लिखते हो प्यार, इश्क, मोहब्बत के अफ़साने
लिखी क्या तुमने
पर्वतमाला की देह पर उभर आए नहोर की दास्ताँ,
या रेशमी बदन को नोंचकर बेल पर छूटकर
घूम रहे पाशवी मनोरोगी का इतराना लिखा
क्या लिखे तुमने बच्चियों के कोमल देह पर रेंगकर
मारकर फेंकने वाले जल्लादों के कारनामें
प्रेम के कूप से मेढ़क सी छलांग लगाकर निकलो बाहर
सो रहे समाज को खरापन का आईना दिखाना होगा
विस्मृत तिथि न बन जाए वारदातें
खोलने को राज़ बेहद पड़े है, पर्दा उठाने की कोशिश तो करो
माना कि समुन्दर गहरा है कश्ती उतारनी होगी
गोते लगाकर घटनाओं को तार-तार कर दो
कलम को शमशीर का रुप देकर
बिच्छुओं का ज़हर स्याही की जगह भर लो
जागो न.. केवल प्रेम में क्या रखा है
अल्फ़ाज़ों की कंटिली ऐसी बारिश हो जाए कि,
कसमसाने लगे कविताएं और खोखली कानून व्यवस्था
टूटकर ढ़ेर हो जाए
तीखे डंक की त्सुनामी सृजनता में भरकर निर्भिक बन घेर लो
कलम दंड दिला सकती है हर अनैतिकता को
कड़ापन होना चाहिए तसव्वुर के कण-कण में
गहरा मौन अभिव्यक्ति की मौत है
अल्फ़ाज़ों के ज़रिए चिल्लाओ, और ज़ोर से चिल्लाओ
चिल्ला-चिल्लाकर अदालत को व्यग्र कर दो
समाज में फैली बदी को चुनौती दो
क्यों लिखना है ऐसा जिसमें समाज का उद्धार न हो
शब्दों में अमृत सींचकर कलम को मृत होने से बचा लो
क्यों जीना है ऐसे शरीर के साथ जिसमें आत्मा का वास न हो।
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