काव्य पुस्तक
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पौरवी
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हौले से पलकों की चिलमन तो उठाओ पौरवी
ख़्वाबगाह के भीतर भरापूरा बागीचा समेटे बैठी हो।
इत्र का स्त्रोत तुम्हारी साँसो से बहे
पोरों को भिंचे छुपा रही हो ग्रीष्म की गर्मी
ग्रिवा में पाले बैशाखी तिश्नगी
हथेलियों पर ...
ख़्वाबगाह के भीतर भरापूरा बागीचा समेटे बैठी हो।
इत्र का स्त्रोत तुम्हारी साँसो से बहे
पोरों को भिंचे छुपा रही हो ग्रीष्म की गर्मी
ग्रिवा में पाले बैशाखी तिश्नगी
हथेलियों पर ...
Storyline
हौले से पलकों की चिलमन तो उठाओ पौरवी
ख़्वाबगाह के भीतर भरापूरा बागीचा समेटे बैठी हो।
इत्र का स्त्रोत तुम्हारी साँसो से बहे
पोरों को भिंचे छुपा रही हो ग्रीष्म की गर्मी
ग्रिवा में पाले बैशाखी तिश्नगी
हथेलियों पर सारे मौसम का स्वाद भरे बैठी हो।
होठों पर शरद की शबनम है ठहरी
सीने का उछाल समुन्दर की लहरों सम
गर्दन पर ठहरे तिल में जानाँ
दुनिया की सारी रानाइयाँ समेटकर क्या करोगी?
दामिनी सी गरजो बाला सावन का सार
तुम्हारे नैनों की शुआओं में पोते बैठी हो।
भाल पर झूलती अलकें सँवार लो
लगता है मानों मेघों ने महफ़िल सजाई हो
नाखून की गुलाबी परतों पर पुलक पट बिछाकर
प्रात:काल में पत्तों पर ठहरी ओस बूँद सी लगती हो।
घूप, अर्घ्य, चन्दन सारे पिंड़लियों की शोभा
चलती हो तो होते कंगाल लूट जाता सारा संसार
विस्तृत नभ का तुझ में वास।
तुम्हारी लौ में पलकर लघु आभा बने विराट
सांझ के दूत सी स्वर लहरी तुम हौले चलकर आओ न
अश्रृओ की दीपावली पर तेल सुकून का सींच जाओ
शलभ विहिन सी स्याह रात में
सुनहरी सी ओस नहाई सुबह बनकर बैठी हो।
अतुल वरदान पाया तुमने ईश्वर की असीम चौखट से
देखो देबीना मुट्ठी भिंच लो डूबे नहीं सितारे जग के
सौर मंडल के सारे रहस्य अपनी लकीरों में छुपाए बैठी हो।
जा रहा जिस पंथ ये युग मृदुल घन को चीरकर
तम का अंत तुम्हारी काया से झरती ज्योति
उस पंथ का अग्रीम छोर अपने उर में छुपाए बैठी हो।
मांगे जो संसार तुमसे निर्बाध नेह की धार
आर्द्र नयन में अंकित करके स्नेह संदेश के तार
मुस्कान मले कर देना सुंदरी सर्वस्व अपना वार
विजय तिलक के सिंदूर कुमकुम हँसी में सजाए बैठी हो।
ख़्वाबगाह के भीतर भरापूरा बागीचा समेटे बैठी हो।
इत्र का स्त्रोत तुम्हारी साँसो से बहे
पोरों को भिंचे छुपा रही हो ग्रीष्म की गर्मी
ग्रिवा में पाले बैशाखी तिश्नगी
हथेलियों पर सारे मौसम का स्वाद भरे बैठी हो।
होठों पर शरद की शबनम है ठहरी
सीने का उछाल समुन्दर की लहरों सम
गर्दन पर ठहरे तिल में जानाँ
दुनिया की सारी रानाइयाँ समेटकर क्या करोगी?
दामिनी सी गरजो बाला सावन का सार
तुम्हारे नैनों की शुआओं में पोते बैठी हो।
भाल पर झूलती अलकें सँवार लो
लगता है मानों मेघों ने महफ़िल सजाई हो
नाखून की गुलाबी परतों पर पुलक पट बिछाकर
प्रात:काल में पत्तों पर ठहरी ओस बूँद सी लगती हो।
घूप, अर्घ्य, चन्दन सारे पिंड़लियों की शोभा
चलती हो तो होते कंगाल लूट जाता सारा संसार
विस्तृत नभ का तुझ में वास।
तुम्हारी लौ में पलकर लघु आभा बने विराट
सांझ के दूत सी स्वर लहरी तुम हौले चलकर आओ न
अश्रृओ की दीपावली पर तेल सुकून का सींच जाओ
शलभ विहिन सी स्याह रात में
सुनहरी सी ओस नहाई सुबह बनकर बैठी हो।
अतुल वरदान पाया तुमने ईश्वर की असीम चौखट से
देखो देबीना मुट्ठी भिंच लो डूबे नहीं सितारे जग के
सौर मंडल के सारे रहस्य अपनी लकीरों में छुपाए बैठी हो।
जा रहा जिस पंथ ये युग मृदुल घन को चीरकर
तम का अंत तुम्हारी काया से झरती ज्योति
उस पंथ का अग्रीम छोर अपने उर में छुपाए बैठी हो।
मांगे जो संसार तुमसे निर्बाध नेह की धार
आर्द्र नयन में अंकित करके स्नेह संदेश के तार
मुस्कान मले कर देना सुंदरी सर्वस्व अपना वार
विजय तिलक के सिंदूर कुमकुम हँसी में सजाए बैठी हो।
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पौरवी
Nov 11, 2025
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