काव्य पुस्तक
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ख़लल
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ख़लल डालो आज मेरे एकांत में
बेहिसाब लिखी गई हूँ
पढ़ लो मुझे आज मैं भीतर से शांत हूँ
एकांत भंग होने का कोई डर नहीं
सदियों से मूक व्यक्ति के गले में गूँजती धुन सी
अव्यक्त, अनपढ़ी, आश्वस्त पड़ी हूँ
आज ...
बेहिसाब लिखी गई हूँ
पढ़ लो मुझे आज मैं भीतर से शांत हूँ
एकांत भंग होने का कोई डर नहीं
सदियों से मूक व्यक्ति के गले में गूँजती धुन सी
अव्यक्त, अनपढ़ी, आश्वस्त पड़ी हूँ
आज ...
Storyline
ख़लल डालो आज मेरे एकांत में
बेहिसाब लिखी गई हूँ
पढ़ लो मुझे आज मैं भीतर से शांत हूँ
एकांत भंग होने का कोई डर नहीं
सदियों से मूक व्यक्ति के गले में गूँजती धुन सी
अव्यक्त, अनपढ़ी, आश्वस्त पड़ी हूँ
आज उचटती द्रष्टि से नहीं
हर एक परत उधेड़कर मुझे पढ़ लो
अपने में डूबी आत्मस्त नही
आज पढ़ पाओगे मुझे ऐसे, जैसे
झील के स्थिर जल में आसमान का रंग
धवल, उजला, दुधिया साफ़ दिखाई देता है
नहीं पढ़ी गई तो पिघल जाऊँगी
जितनी इजाज़त दी है उससे अधिक पढ़ना
आज मैं तुम्हें अपनी सी लगूँगी
तुम्हारे मन की मिट्टी में घुलकर
सम्मोहन पैदा करूँगी
गा लो मुझे आख़री पंक्ति तक
महफ़िल से उठकर नहीं जाऊँगी
कोई संयम मत रखना
किसी-किसी शाम को ही खुलते है दरिचे
मुझे मेरी ही चौखट से उठने मत देना
तुम आनंद लो आज
मैं कोई रहस्यमय इतिहास नहीं
प्रशांत, धीर, निर्मल एहसास उपस्थित हुए है
खुली किताब बन तुम्हारे आगे
तुम्हारे पढ़ने भर से मैं पूर्ण हो जाऊँगी
गर पढ़ लिया तुमने पूरा मुझे
मैं जोगन बन जाऊँगी, जिसकी नौबत न आएगी
हर कोई करवट रहित बिस्तर पर
नींद की गोली समझकर निगल लेता है
फिर दो पन्ना भर पढ़कर छोड़ देता है
आज तक कहाँ कोई मुझे पूरा पढ़ पाया
आज तुम्हें इज़ाज़त है मुझे पूरा पढ़ लो
ख़लल डालकर मेरे एकांत में।
बेहिसाब लिखी गई हूँ
पढ़ लो मुझे आज मैं भीतर से शांत हूँ
एकांत भंग होने का कोई डर नहीं
सदियों से मूक व्यक्ति के गले में गूँजती धुन सी
अव्यक्त, अनपढ़ी, आश्वस्त पड़ी हूँ
आज उचटती द्रष्टि से नहीं
हर एक परत उधेड़कर मुझे पढ़ लो
अपने में डूबी आत्मस्त नही
आज पढ़ पाओगे मुझे ऐसे, जैसे
झील के स्थिर जल में आसमान का रंग
धवल, उजला, दुधिया साफ़ दिखाई देता है
नहीं पढ़ी गई तो पिघल जाऊँगी
जितनी इजाज़त दी है उससे अधिक पढ़ना
आज मैं तुम्हें अपनी सी लगूँगी
तुम्हारे मन की मिट्टी में घुलकर
सम्मोहन पैदा करूँगी
गा लो मुझे आख़री पंक्ति तक
महफ़िल से उठकर नहीं जाऊँगी
कोई संयम मत रखना
किसी-किसी शाम को ही खुलते है दरिचे
मुझे मेरी ही चौखट से उठने मत देना
तुम आनंद लो आज
मैं कोई रहस्यमय इतिहास नहीं
प्रशांत, धीर, निर्मल एहसास उपस्थित हुए है
खुली किताब बन तुम्हारे आगे
तुम्हारे पढ़ने भर से मैं पूर्ण हो जाऊँगी
गर पढ़ लिया तुमने पूरा मुझे
मैं जोगन बन जाऊँगी, जिसकी नौबत न आएगी
हर कोई करवट रहित बिस्तर पर
नींद की गोली समझकर निगल लेता है
फिर दो पन्ना भर पढ़कर छोड़ देता है
आज तक कहाँ कोई मुझे पूरा पढ़ पाया
आज तुम्हें इज़ाज़त है मुझे पूरा पढ़ लो
ख़लल डालकर मेरे एकांत में।
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