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तुम्हारी तलबगार
काव्य पुस्तक
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तुम्हारी तलबगार

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तुम्हारी तलबगार बन सुर्खियों में रहने दो
मुझे मंत्र की तरह मत बुदबुदाओ
मैं सुंदरत्तम शोर हूँ मुझे वाद्यों सी बजाओ
सितार बन जाऊँ जो तुम तर्जनी से रिझाओ
संसार मुझे गौर से सुन रहा है
मेरे अस्तित्व की ओरा में समा ...
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Storyline

तुम्हारी तलबगार बन सुर्खियों में रहने दो
मुझे मंत्र की तरह मत बुदबुदाओ
मैं सुंदरत्तम शोर हूँ मुझे वाद्यों सी बजाओ
सितार बन जाऊँ जो तुम तर्जनी से रिझाओ
संसार मुझे गौर से सुन रहा है
मेरे अस्तित्व की ओरा में समा जाओ
रागिनी हूँ स्नेह की या समझो कोई नग्मा हूँ
सुर छेड़ो, छेड़कर सुर मुझे गाओ
पछुआ हवा का बिस्तर बनाकर चलो सोते है
विधू की हँसी सुनते मुझे सहलाओ
मैं परछाई धूप की ओढ़कर मुझे सो जाओ
देखो सहरा की भूरी रेत मल्हार गा रही है
एहसासों का बाँध तोड़कर संग मेरे बह जाओ
मैं प्रार्थना हूँ पलभर में फलीभूत हो जाऊँ
ज़रा हाथ जोड़कर आँख मूँदे गुनगुनाओ
किसने रोका है? करीब आकर पेशानी चूमकर
मेरे अंग अंग बस जाओ
मेरी गुलाबी हथेलियों की सतह पर चुम्बन बोकर
स्पंदनों की अंगड़ाई में आतिश भर जाओ
पहन लो शौक़ से मैं प्रेम हूँ आकंठ मुझ में डूब जाओ
बिंध दो मुझे पहनाकर अपने प्रीत की नथनी
पिघल जाऊँ मोम सी जो तुम इश्क ज्योत बन जाओ
खेत में जाकर गेहूँ की बालियो में मत ढूँढो
चौखट का माथा चूम लो वहीं कहीं मिल जाऊँगी
सैंकड़ो राज़ को रिहाई दे दूँ जो छुपे है मेरी हँसी में
आलिंगन का आसरा लेकर साँस में मेरी बन जाओ
प्रीत का पहाड़ पीला न पड़ जाए
सावन सी पावन प्रीत करके यज्ञ सी आग बन जाओ
मैं बन जाऊँगी समर्पण तुम ओम की ध्वनि बन छा जाओ
कामना किसे यहाँ मोक्ष की? मैं तुम बनकर रह जाऊँ।
मुझे अपने आप में मिला दो।

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तुम्हारी तलबगार
Nov 11, 2025
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