काव्य
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अनुकृति नहीं रुप की तेरी
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अनुकृति नहीं रुप की तेरी,
जो रुप तुने पाया है!
उपमें भी सिमटकर उपमान में समाया है,
सच–मुच उस कला की अंतिम निखार हो तुम,
गर रुप की है सीमा,
सीमा से पार हो तुम!!!!
2. नज़र मिली तो मुस्कान बनी,
धड़कन में एक ...
जो रुप तुने पाया है!
उपमें भी सिमटकर उपमान में समाया है,
सच–मुच उस कला की अंतिम निखार हो तुम,
गर रुप की है सीमा,
सीमा से पार हो तुम!!!!
2. नज़र मिली तो मुस्कान बनी,
धड़कन में एक ...
Storyline
अनुकृति नहीं रुप की तेरी,
जो रुप तुने पाया है!
उपमें भी सिमटकर उपमान में समाया है,
सच–मुच उस कला की अंतिम निखार हो तुम,
गर रुप की है सीमा,
सीमा से पार हो तुम!!!!
2. नज़र मिली तो मुस्कान बनी,
धड़कन में एक मिठास घुली।
बिन बोले ही कह दी बातें,
तेरी मेरी ये पहली मुलाक़ात चली।
3. ठंडी हवा का स्पर्श मिला,
मन जैसे निर्मल हो गया।
थोड़ी देर जो आँखें मूँदीं,
संसार सारा शांत हो गया।
4. तेरी आहट से महके पल,
मन में मीठा सुर छेड़ा।
जैसे चाँद उतर आया हो,
तेरा चेहरा इतना खड़ा-खड़ा।
धूप में बैठा मन मुस्काए,
जैसे समय ठहर जाए।
जो रुप तुने पाया है!
उपमें भी सिमटकर उपमान में समाया है,
सच–मुच उस कला की अंतिम निखार हो तुम,
गर रुप की है सीमा,
सीमा से पार हो तुम!!!!
2. नज़र मिली तो मुस्कान बनी,
धड़कन में एक मिठास घुली।
बिन बोले ही कह दी बातें,
तेरी मेरी ये पहली मुलाक़ात चली।
3. ठंडी हवा का स्पर्श मिला,
मन जैसे निर्मल हो गया।
थोड़ी देर जो आँखें मूँदीं,
संसार सारा शांत हो गया।
4. तेरी आहट से महके पल,
मन में मीठा सुर छेड़ा।
जैसे चाँद उतर आया हो,
तेरा चेहरा इतना खड़ा-खड़ा।
धूप में बैठा मन मुस्काए,
जैसे समय ठहर जाए।
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