काव्य पुस्तक
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गर तुम
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शिव मंदिर के पीछे, नदी किनारे लगे मेले में
गर तुम मुझे पीछे से पुकारते
तुम्हारी आवाज़ सुन मैं पीछे मुड़ती
और तुम मुझे गले लगा लेते तो क्या होता जानते हो?
उन लम्हों की कशिश से आकर्षित होते
मेरी आँखों में विस्मय की...
गर तुम मुझे पीछे से पुकारते
तुम्हारी आवाज़ सुन मैं पीछे मुड़ती
और तुम मुझे गले लगा लेते तो क्या होता जानते हो?
उन लम्हों की कशिश से आकर्षित होते
मेरी आँखों में विस्मय की...
Storyline
शिव मंदिर के पीछे, नदी किनारे लगे मेले में
गर तुम मुझे पीछे से पुकारते
तुम्हारी आवाज़ सुन मैं पीछे मुड़ती
और तुम मुझे गले लगा लेते तो क्या होता जानते हो?
उन लम्हों की कशिश से आकर्षित होते
मेरी आँखों में विस्मय की बिजली कड़कती
तोड़कर संसार के नियम मैं तुम्हारे अंग लग जाती
कवियों के तसव्वुर में रोमांच भर जाता
कविताएं अंगड़ाई लेकर उठती
मौसम अचानक से बदल जाता
उस पर भी तुम मुझे छेड़ते उस हरकत को देख
आग को पानी से इश्क हो जाता
आसमान का सीना चीरकर
बिन मौसम बादल बेतहाशा बरस जाते
कहते जो तुम कानों में कुछ मेरे
हमदोनों की हल्की गुफ़्तगू सुन
कायनात की हर शै रंगीन हो जाती
मेरी लकीरों से दु:ख की छाया मिट जाती
घरती के सीने में बोए बीज लहलहाती फसलों में
तब्दील हो जाते
शेर शिकार करने से पीछे मुड़ जाते
मंदिरों के कपाट खुल जाते
उस पर भी गर तुम मेरे गालों को चूमते
कस्तुरी मल जाती हर घर की दीवारों पर
आसमान में अभिसारिकाएं नृत्य करती
ताना हुआ धनुष शिकारी तरकस में रख देता
खरगोश का झूँड मुस्कुराते फुदक उठता
समुन्दर के कँधों पर झूलती लहरें ठहर जाती
मद्धम ढ़लती केसरिया सांझ रुक जाती
देखने अपने युग्मन की आतिश
एक साथ इतने सारे उजले नज़ारों से सजी धरती
रानाइयों की महफ़िल लगती
सोचो तो सही.!
तुम्हारे पुकारने के इंतज़ार में एक कामिनी का
जस्टिन बिबर के गानों पर थिरकते मेले में घूमना
क्या रंग लाता?
उफ़्फ़ तुम भी न ये कहकर मेरे ख़यालों पर
ठंडा पानी बहा गए
"अब बस भी कर बला..
मेले का शोर खामोशी में तब्दील करने का इरादा है क्या?"
गर तुम मुझे पीछे से पुकारते
तुम्हारी आवाज़ सुन मैं पीछे मुड़ती
और तुम मुझे गले लगा लेते तो क्या होता जानते हो?
उन लम्हों की कशिश से आकर्षित होते
मेरी आँखों में विस्मय की बिजली कड़कती
तोड़कर संसार के नियम मैं तुम्हारे अंग लग जाती
कवियों के तसव्वुर में रोमांच भर जाता
कविताएं अंगड़ाई लेकर उठती
मौसम अचानक से बदल जाता
उस पर भी तुम मुझे छेड़ते उस हरकत को देख
आग को पानी से इश्क हो जाता
आसमान का सीना चीरकर
बिन मौसम बादल बेतहाशा बरस जाते
कहते जो तुम कानों में कुछ मेरे
हमदोनों की हल्की गुफ़्तगू सुन
कायनात की हर शै रंगीन हो जाती
मेरी लकीरों से दु:ख की छाया मिट जाती
घरती के सीने में बोए बीज लहलहाती फसलों में
तब्दील हो जाते
शेर शिकार करने से पीछे मुड़ जाते
मंदिरों के कपाट खुल जाते
उस पर भी गर तुम मेरे गालों को चूमते
कस्तुरी मल जाती हर घर की दीवारों पर
आसमान में अभिसारिकाएं नृत्य करती
ताना हुआ धनुष शिकारी तरकस में रख देता
खरगोश का झूँड मुस्कुराते फुदक उठता
समुन्दर के कँधों पर झूलती लहरें ठहर जाती
मद्धम ढ़लती केसरिया सांझ रुक जाती
देखने अपने युग्मन की आतिश
एक साथ इतने सारे उजले नज़ारों से सजी धरती
रानाइयों की महफ़िल लगती
सोचो तो सही.!
तुम्हारे पुकारने के इंतज़ार में एक कामिनी का
जस्टिन बिबर के गानों पर थिरकते मेले में घूमना
क्या रंग लाता?
उफ़्फ़ तुम भी न ये कहकर मेरे ख़यालों पर
ठंडा पानी बहा गए
"अब बस भी कर बला..
मेले का शोर खामोशी में तब्दील करने का इरादा है क्या?"
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