काव्य पुस्तक
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चिंतन
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गहन चिंतन के बाद आज
नारीवाद की ज़मीन को कुरेदकर देखा
कहीं भी पनपता बीज न देखा.!
देखा तो बस पितृसत्तात्म सोच और
खोखली खरपतवार और तिनके से
नारी के वजूद को देखा..
बिखरी पड़ी थी स्वतंत्रता क्षोभ के
सन्नाटों से ...
नारीवाद की ज़मीन को कुरेदकर देखा
कहीं भी पनपता बीज न देखा.!
देखा तो बस पितृसत्तात्म सोच और
खोखली खरपतवार और तिनके से
नारी के वजूद को देखा..
बिखरी पड़ी थी स्वतंत्रता क्षोभ के
सन्नाटों से ...
Storyline
गहन चिंतन के बाद आज
नारीवाद की ज़मीन को कुरेदकर देखा
कहीं भी पनपता बीज न देखा.!
देखा तो बस पितृसत्तात्म सोच और
खोखली खरपतवार और तिनके से
नारी के वजूद को देखा..
बिखरी पड़ी थी स्वतंत्रता क्षोभ के
सन्नाटों से घिरी, साथ ही दिखी
कुछ महिलाएं मुखर होने की सज़ा काटते दिखी..
खैर.! कफ़स तो कहीं नहीं था फिर भी,
पाश बंधे परिंदों सी पुतलियों को ज़रूर देखा..
देखे हरसू महिलाओं के सम्मान में लिखे स्लाॅगन
सुसंगत मानदंडो का चित्रण तो कहीं नहीं दिखा..
पत्रिकाओं को बलात्कारी घटनाओं का
बोझ उठाते देखा,
बेटी के कत्ल पर रोती बिलखती माँओं को देखा
या दहेज के दानव का अट्टहास देखा..
हमें लगा दूर कहीं सर्च लाइट सा झिलमिलाते पड़ा है
ना री वा द
करीब जाकर देखा तो कूड़े में पड़ा काँच
झिलमिला रहा था..
मैं छेद करना नहीं चाहती
लबालब भरी है झूठ, प्रपंच, फरेब से
कश्ती नारीवाद की, पल भर में डूब जाएगी
सच कहूँ सारे कथानक खंगाल लिए
लेकिन समाज के आईने में
हास्यास्पद स्तर से चिपके नारीवाद का
हल्का सा प्रतिबिंब भी नहीं देखा..
नारीवाद का अद्रश्य रुप बड़ा अद्भुत है
नारीवाद शब्द ही कितना संमोहक है,
ये भूत मेरा तब उतरा जब कोख में कट रही
बेटियों के शब देखे,
तो देखी कहीं शराबी पतियों के
हाथों पिटती योषिताएं देखी..
समाज में फैलाया गया छल सा छद्म नारीवाद
कट्टरपंथ क्यों नहीं बन सकता?
नारीवाद को क्यों अंतहीन कहानी सा
छोड़ दिया गया?
नारीवाद को हमने तो बस कोहनी पर चिपके
गुड़ सा देखा, देख तो सकते है खा नहीं सकते.!
इस मुहिम को आघात में बदलते हर महिला
"प्रॉमिसिंग यंग वुमन" की कैरी मुलिगन बन जाए
उससे पहले समाज के ठेकेदारों
नारीवाद को सच के साँचे में ढ़ाल लो वरना,
आगे भी यही अफ़सोस दोहराते कोई न कोई
यही कहेगा कि,
हकीकत की धरा कोरी की कोरी रही
लैंगिक राजनीति की बलि चढ़ते हमने
खोखले नारीवाद को महज़ नारों में बदलते देखा।
नारीवाद की ज़मीन को कुरेदकर देखा
कहीं भी पनपता बीज न देखा.!
देखा तो बस पितृसत्तात्म सोच और
खोखली खरपतवार और तिनके से
नारी के वजूद को देखा..
बिखरी पड़ी थी स्वतंत्रता क्षोभ के
सन्नाटों से घिरी, साथ ही दिखी
कुछ महिलाएं मुखर होने की सज़ा काटते दिखी..
खैर.! कफ़स तो कहीं नहीं था फिर भी,
पाश बंधे परिंदों सी पुतलियों को ज़रूर देखा..
देखे हरसू महिलाओं के सम्मान में लिखे स्लाॅगन
सुसंगत मानदंडो का चित्रण तो कहीं नहीं दिखा..
पत्रिकाओं को बलात्कारी घटनाओं का
बोझ उठाते देखा,
बेटी के कत्ल पर रोती बिलखती माँओं को देखा
या दहेज के दानव का अट्टहास देखा..
हमें लगा दूर कहीं सर्च लाइट सा झिलमिलाते पड़ा है
ना री वा द
करीब जाकर देखा तो कूड़े में पड़ा काँच
झिलमिला रहा था..
मैं छेद करना नहीं चाहती
लबालब भरी है झूठ, प्रपंच, फरेब से
कश्ती नारीवाद की, पल भर में डूब जाएगी
सच कहूँ सारे कथानक खंगाल लिए
लेकिन समाज के आईने में
हास्यास्पद स्तर से चिपके नारीवाद का
हल्का सा प्रतिबिंब भी नहीं देखा..
नारीवाद का अद्रश्य रुप बड़ा अद्भुत है
नारीवाद शब्द ही कितना संमोहक है,
ये भूत मेरा तब उतरा जब कोख में कट रही
बेटियों के शब देखे,
तो देखी कहीं शराबी पतियों के
हाथों पिटती योषिताएं देखी..
समाज में फैलाया गया छल सा छद्म नारीवाद
कट्टरपंथ क्यों नहीं बन सकता?
नारीवाद को क्यों अंतहीन कहानी सा
छोड़ दिया गया?
नारीवाद को हमने तो बस कोहनी पर चिपके
गुड़ सा देखा, देख तो सकते है खा नहीं सकते.!
इस मुहिम को आघात में बदलते हर महिला
"प्रॉमिसिंग यंग वुमन" की कैरी मुलिगन बन जाए
उससे पहले समाज के ठेकेदारों
नारीवाद को सच के साँचे में ढ़ाल लो वरना,
आगे भी यही अफ़सोस दोहराते कोई न कोई
यही कहेगा कि,
हकीकत की धरा कोरी की कोरी रही
लैंगिक राजनीति की बलि चढ़ते हमने
खोखले नारीवाद को महज़ नारों में बदलते देखा।
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चिंतन
Nov 11, 2025
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