काव्य पुस्तक
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नपुंसक समाज का हिस्सा हम
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इस युग की सबसे बड़ी त्रासदी पर
मौन की चट्टानें फेंककर दरिंदों की हरकतों पर
जायज़ की मोहर लगाना कितना जायज़?
तमाशबीन है मैं, तुम और हम
सन्नाटा ओढ़े सो रही है हमारी आत्माएं
फफक कर रो नहीं देती
न दांत कचकचाते ...
मौन की चट्टानें फेंककर दरिंदों की हरकतों पर
जायज़ की मोहर लगाना कितना जायज़?
तमाशबीन है मैं, तुम और हम
सन्नाटा ओढ़े सो रही है हमारी आत्माएं
फफक कर रो नहीं देती
न दांत कचकचाते ...
Storyline
इस युग की सबसे बड़ी त्रासदी पर
मौन की चट्टानें फेंककर दरिंदों की हरकतों पर
जायज़ की मोहर लगाना कितना जायज़?
तमाशबीन है मैं, तुम और हम
सन्नाटा ओढ़े सो रही है हमारी आत्माएं
फफक कर रो नहीं देती
न दांत कचकचाते विद्रोह की तलवार उठाते है हम
नपुंसक समाज का हिस्सा है हम
छूट जाते है आराम से बलात्कारी कंजर
बेल की तख़्ती लगाकर बड़ी शान से
हमारे ही आस-पास आराम से घूम रहे होते है
वासनाएं स्थगित नहीं होती ठंडा पानी ड़ालने से
कब तक महज़ ख़ेद मनाकर फ़र्ज़ पूरा करते रहेंगे?
बेढ़ंगे तंत्र पर सवाल उठाना कब सीखेंगे?
मरोड़नी होगी हवस की शिखाएं
परिणाम की प्रक्रिया कहीं से तो शुरू करनी होगी
छूट रहे है जमानत पर मलिन चेहरे
इस नाइन्साफ़ी पर कौन ग्रंथ लिखेंगे
क्या कोई लाठी नहीं बनी नाम इनके लिखे हो जिस पर
कब तक बलि चढ़ती रहेगी बेटियाँ?
गुनहगारों की चुन चुनकर शिनाख़्त तो करनी होगी
मुक्ति मांग रही है मासूमों की सहनशीलता
सुगंध की आदत हमसे छूटती जा रही है
मटमैले समाज के हम आदी होते जा रहे है
सभी फूलों को भँवरे झूठा कर देंगे तो
संसार का उपवन गंधिला हो जाएगा
भेड़ियों पर दयालुता ये भी क्या बात हुई?
कंटिला बाँस ढूँढे चलो किसी जंगल में तो होगा
वक्त की मांग है खरगोश को कातिल बनना पड़ेगा
कोमल चीज़ देख डर जाए दरिंदे ऐसी लाठी बनानी होगी
हिम्मत करने वालों कतार में लगो
कारवाँ के आगे मंज़िलों को हारते देखा है हमने
आओ मिलकर निर्लज्जता पर नैतिकता से वार करें।
मौन की चट्टानें फेंककर दरिंदों की हरकतों पर
जायज़ की मोहर लगाना कितना जायज़?
तमाशबीन है मैं, तुम और हम
सन्नाटा ओढ़े सो रही है हमारी आत्माएं
फफक कर रो नहीं देती
न दांत कचकचाते विद्रोह की तलवार उठाते है हम
नपुंसक समाज का हिस्सा है हम
छूट जाते है आराम से बलात्कारी कंजर
बेल की तख़्ती लगाकर बड़ी शान से
हमारे ही आस-पास आराम से घूम रहे होते है
वासनाएं स्थगित नहीं होती ठंडा पानी ड़ालने से
कब तक महज़ ख़ेद मनाकर फ़र्ज़ पूरा करते रहेंगे?
बेढ़ंगे तंत्र पर सवाल उठाना कब सीखेंगे?
मरोड़नी होगी हवस की शिखाएं
परिणाम की प्रक्रिया कहीं से तो शुरू करनी होगी
छूट रहे है जमानत पर मलिन चेहरे
इस नाइन्साफ़ी पर कौन ग्रंथ लिखेंगे
क्या कोई लाठी नहीं बनी नाम इनके लिखे हो जिस पर
कब तक बलि चढ़ती रहेगी बेटियाँ?
गुनहगारों की चुन चुनकर शिनाख़्त तो करनी होगी
मुक्ति मांग रही है मासूमों की सहनशीलता
सुगंध की आदत हमसे छूटती जा रही है
मटमैले समाज के हम आदी होते जा रहे है
सभी फूलों को भँवरे झूठा कर देंगे तो
संसार का उपवन गंधिला हो जाएगा
भेड़ियों पर दयालुता ये भी क्या बात हुई?
कंटिला बाँस ढूँढे चलो किसी जंगल में तो होगा
वक्त की मांग है खरगोश को कातिल बनना पड़ेगा
कोमल चीज़ देख डर जाए दरिंदे ऐसी लाठी बनानी होगी
हिम्मत करने वालों कतार में लगो
कारवाँ के आगे मंज़िलों को हारते देखा है हमने
आओ मिलकर निर्लज्जता पर नैतिकता से वार करें।
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