काव्य
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"मैं, मेरी खामोशी और तुम"
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आज फिर दिल भारी है, इसलिए ये खत खुद से लिख रही हूँ…
पता नहीं क्यों, इतने सालों बाद भी तुम मेरे दिल के इतने करीब हो। कभी-कभी लगता है जैसे मेरा ही कोई हिस्सा मुझसे दूर कहीं रह गया है। मैं आज किसी और के साथ बंधन में...
पता नहीं क्यों, इतने सालों बाद भी तुम मेरे दिल के इतने करीब हो। कभी-कभी लगता है जैसे मेरा ही कोई हिस्सा मुझसे दूर कहीं रह गया है। मैं आज किसी और के साथ बंधन में...
Storyline
आज फिर दिल भारी है, इसलिए ये खत खुद से लिख रही हूँ…
पता नहीं क्यों, इतने सालों बाद भी तुम मेरे दिल के इतने करीब हो। कभी-कभी लगता है जैसे मेरा ही कोई हिस्सा मुझसे दूर कहीं रह गया है। मैं आज किसी और के साथ बंधन में हूँ, जिम्मेदारियाँ हैं, रिश्ते हैं… फिर भी दिल के किसी कोने में तुम आज भी वैसे ही बसे हो।
मैं तुमसे मिलना भी नहीं चाहती… क्योंकि डर लगता है। डर इस बात का कि अगर तुम सामने आ गए, तो मैं खुद को रोक नहीं पाऊँगी। या तो टूट जाऊँगी, या फिर रो पड़ूँगी। और फिर मैं क्या जवाब दूँगी उस इंसान को, जिसके साथ आज मेरा रिश्ता है? कैसे समझाऊँगी कि दिल आज भी किसी और के लिए क्यों रो जाता है?
मैंने सोचा था कि तुम चले गए तो मैं भी आगे बढ़ जाऊँगी… कुछ बन जाऊँगी, खुद को संभाल लूँगी। और हाँ, मैं आगे बढ़ी भी… बहुत कुछ किया, बहुत कुछ सहा। लेकिन आज फिर ऐसा लग रहा है जैसे मैं वहीं खड़ी हूँ — उसी मोड़ पर, जहाँ से सब शुरू हुआ था।
सबके लिए कितना भी कर लूँ, हर मोड़ पर मैं ही गलत ठहरा दी जाती हूँ। शायद इसलिए क्योंकि मैं एक लड़की हूँ… बार-बार ये एहसास दिलाया जाता है। पर मुझे पता है मैंने कैसे अपने आप को संभाला है, कैसे अपने खर्च उठाए हैं, कैसे अपनी बीमारी में भी बिना किसी सहारे के खड़ी रही हूँ।
आज फिर से टूट गई हूँ मैं…
आँखों में आँसू हैं, दिल में दर्द है… और मैं इस कमरे की चार दीवारों में अकेली बैठी हूँ।
कभी-कभी लगता है शायद वक्त ही मेरा खराब था… और है भी। अगर थोड़ा सा भी अच्छा होता, तो शायद कोई तो होता जो मेरा होता, जो मुझे समझता।
पर एक बात अब समझ आ रही है —
शायद मुझे ही खुद का सहारा बनना होगा।
क्योंकि आखिर में…
मैं ही हूँ जो हर बार खुद को संभालती हूँ।
पता नहीं क्यों, इतने सालों बाद भी तुम मेरे दिल के इतने करीब हो। कभी-कभी लगता है जैसे मेरा ही कोई हिस्सा मुझसे दूर कहीं रह गया है। मैं आज किसी और के साथ बंधन में हूँ, जिम्मेदारियाँ हैं, रिश्ते हैं… फिर भी दिल के किसी कोने में तुम आज भी वैसे ही बसे हो।
मैं तुमसे मिलना भी नहीं चाहती… क्योंकि डर लगता है। डर इस बात का कि अगर तुम सामने आ गए, तो मैं खुद को रोक नहीं पाऊँगी। या तो टूट जाऊँगी, या फिर रो पड़ूँगी। और फिर मैं क्या जवाब दूँगी उस इंसान को, जिसके साथ आज मेरा रिश्ता है? कैसे समझाऊँगी कि दिल आज भी किसी और के लिए क्यों रो जाता है?
मैंने सोचा था कि तुम चले गए तो मैं भी आगे बढ़ जाऊँगी… कुछ बन जाऊँगी, खुद को संभाल लूँगी। और हाँ, मैं आगे बढ़ी भी… बहुत कुछ किया, बहुत कुछ सहा। लेकिन आज फिर ऐसा लग रहा है जैसे मैं वहीं खड़ी हूँ — उसी मोड़ पर, जहाँ से सब शुरू हुआ था।
सबके लिए कितना भी कर लूँ, हर मोड़ पर मैं ही गलत ठहरा दी जाती हूँ। शायद इसलिए क्योंकि मैं एक लड़की हूँ… बार-बार ये एहसास दिलाया जाता है। पर मुझे पता है मैंने कैसे अपने आप को संभाला है, कैसे अपने खर्च उठाए हैं, कैसे अपनी बीमारी में भी बिना किसी सहारे के खड़ी रही हूँ।
आज फिर से टूट गई हूँ मैं…
आँखों में आँसू हैं, दिल में दर्द है… और मैं इस कमरे की चार दीवारों में अकेली बैठी हूँ।
कभी-कभी लगता है शायद वक्त ही मेरा खराब था… और है भी। अगर थोड़ा सा भी अच्छा होता, तो शायद कोई तो होता जो मेरा होता, जो मुझे समझता।
पर एक बात अब समझ आ रही है —
शायद मुझे ही खुद का सहारा बनना होगा।
क्योंकि आखिर में…
मैं ही हूँ जो हर बार खुद को संभालती हूँ।
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