Khaani
Junction
Home Novels काव्य पुस्तक रुख़सत के वक्त
रुख़सत के वक्त
काव्य पुस्तक
काव्य पुस्तक

रुख़सत के वक्त

0.0 (0 Reviews) 169 Reads Ongoing
रुख़सत के वक्त
शिप्रा नदी के घाट पर
अल्ता मली पिंडलियों को चूमकर
तुमने कहा था तुम मेरी साॅंसे हो
कभी रूठना नहीं
मैं आऊॅंगा अगले साल इसी दिन
मुझे इख़्तियार है इंतज़ार में हूॅं
मैंने बर्बाद नहीं होने दिया
चु...
Read Now

Storyline

रुख़सत के वक्त
शिप्रा नदी के घाट पर
अल्ता मली पिंडलियों को चूमकर
तुमने कहा था तुम मेरी साॅंसे हो
कभी रूठना नहीं
मैं आऊॅंगा अगले साल इसी दिन
मुझे इख़्तियार है इंतज़ार में हूॅं
मैंने बर्बाद नहीं होने दिया
चुम्बन का चटकार
एक पैर पर खड़ी हूॅं साल भर से
ज़मीन पर गढ़े पैर के पास
लाल फूल उग आया है
कसम उस फूल की तुम्हें
शाम ढ़लने से पहले आ जाना
जानते हो? तुम्हारी शान में
कितने फितूर पाले हैं हृदय ने
दूर से तुम्हें आता देख
कमर में ठूंसा पल्लू झटक दूॅंगी
बालों की कबरी बाॅंध लूॅंगी क्योंकि
खुले गेसू हवा की अठखेलियों का जवाब देते
तुम्हारे चेहरे को ढक देते है
बाॅंहें फैलाते, चिल्लाते दौड़ पडूॅंगी
बेशर्म बनकर लिपट जाऊॅंगी
तुम्हारे सीने पर सर रखकर रो पडूॅंगी
बालों में ऊॅंगलियाॅं घुमाते
पलकों से पलकें मिलाकर
लबों से लबों का युग्मन रचूॅंगी
हलक में अटकी गुफ़्तगू को स्वतंत्र करते
रात भर तुमसे बतियाऊॅंगी
कह देती हूॅं हाॅं..
न सोऊॅंगी न दूॅंगी सोने
साल भर की तपस्या का सिला पूरा लूॅंगी
पैर के अंगूठे ने शोर मचाया है
इस बार पिंडलियों को नहीं
अंगूठे को चूमना वहाॅं से एक नस
सीधी उर तक जाती है
जहाॅं बसेरा चूमने वाले का है
अरे..! ये क्या? शिप्रा सूख रही है
पैर लुढ़क रहा है
लाल फूल मुरझा रहा है
अंगूठा निढ़ाल होते सिकुड़ रहा है
कमर में ठूंसा पल्लू चूभ रहा है
अल्ता पिघल रहा है
शाम ने अपना साम्राज्य समेट लिया है
रात के तमस ने मेरे वजूद को
अपनी गिरफ़्त में कर लिया है
आज का दिन तो खास था बहुत खास
ये भी आम होते निकल गया है
और तो क्या बोलूॅं
एक साल से अध्धर ताल झुलता पैर
आहिस्ता-आहिस्ता ज़मीन से जुड़ रहा है।

All Chapters (1)

Chapter 0
रुख़सत के वक्त
Nov 11, 2025
Read
No reviews yet.
No comments yet.