काव्य पुस्तक
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रुख़सत के वक्त
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रुख़सत के वक्त
शिप्रा नदी के घाट पर
अल्ता मली पिंडलियों को चूमकर
तुमने कहा था तुम मेरी साॅंसे हो
कभी रूठना नहीं
मैं आऊॅंगा अगले साल इसी दिन
मुझे इख़्तियार है इंतज़ार में हूॅं
मैंने बर्बाद नहीं होने दिया
चु...
शिप्रा नदी के घाट पर
अल्ता मली पिंडलियों को चूमकर
तुमने कहा था तुम मेरी साॅंसे हो
कभी रूठना नहीं
मैं आऊॅंगा अगले साल इसी दिन
मुझे इख़्तियार है इंतज़ार में हूॅं
मैंने बर्बाद नहीं होने दिया
चु...
Storyline
रुख़सत के वक्त
शिप्रा नदी के घाट पर
अल्ता मली पिंडलियों को चूमकर
तुमने कहा था तुम मेरी साॅंसे हो
कभी रूठना नहीं
मैं आऊॅंगा अगले साल इसी दिन
मुझे इख़्तियार है इंतज़ार में हूॅं
मैंने बर्बाद नहीं होने दिया
चुम्बन का चटकार
एक पैर पर खड़ी हूॅं साल भर से
ज़मीन पर गढ़े पैर के पास
लाल फूल उग आया है
कसम उस फूल की तुम्हें
शाम ढ़लने से पहले आ जाना
जानते हो? तुम्हारी शान में
कितने फितूर पाले हैं हृदय ने
दूर से तुम्हें आता देख
कमर में ठूंसा पल्लू झटक दूॅंगी
बालों की कबरी बाॅंध लूॅंगी क्योंकि
खुले गेसू हवा की अठखेलियों का जवाब देते
तुम्हारे चेहरे को ढक देते है
बाॅंहें फैलाते, चिल्लाते दौड़ पडूॅंगी
बेशर्म बनकर लिपट जाऊॅंगी
तुम्हारे सीने पर सर रखकर रो पडूॅंगी
बालों में ऊॅंगलियाॅं घुमाते
पलकों से पलकें मिलाकर
लबों से लबों का युग्मन रचूॅंगी
हलक में अटकी गुफ़्तगू को स्वतंत्र करते
रात भर तुमसे बतियाऊॅंगी
कह देती हूॅं हाॅं..
न सोऊॅंगी न दूॅंगी सोने
साल भर की तपस्या का सिला पूरा लूॅंगी
पैर के अंगूठे ने शोर मचाया है
इस बार पिंडलियों को नहीं
अंगूठे को चूमना वहाॅं से एक नस
सीधी उर तक जाती है
जहाॅं बसेरा चूमने वाले का है
अरे..! ये क्या? शिप्रा सूख रही है
पैर लुढ़क रहा है
लाल फूल मुरझा रहा है
अंगूठा निढ़ाल होते सिकुड़ रहा है
कमर में ठूंसा पल्लू चूभ रहा है
अल्ता पिघल रहा है
शाम ने अपना साम्राज्य समेट लिया है
रात के तमस ने मेरे वजूद को
अपनी गिरफ़्त में कर लिया है
आज का दिन तो खास था बहुत खास
ये भी आम होते निकल गया है
और तो क्या बोलूॅं
एक साल से अध्धर ताल झुलता पैर
आहिस्ता-आहिस्ता ज़मीन से जुड़ रहा है।
शिप्रा नदी के घाट पर
अल्ता मली पिंडलियों को चूमकर
तुमने कहा था तुम मेरी साॅंसे हो
कभी रूठना नहीं
मैं आऊॅंगा अगले साल इसी दिन
मुझे इख़्तियार है इंतज़ार में हूॅं
मैंने बर्बाद नहीं होने दिया
चुम्बन का चटकार
एक पैर पर खड़ी हूॅं साल भर से
ज़मीन पर गढ़े पैर के पास
लाल फूल उग आया है
कसम उस फूल की तुम्हें
शाम ढ़लने से पहले आ जाना
जानते हो? तुम्हारी शान में
कितने फितूर पाले हैं हृदय ने
दूर से तुम्हें आता देख
कमर में ठूंसा पल्लू झटक दूॅंगी
बालों की कबरी बाॅंध लूॅंगी क्योंकि
खुले गेसू हवा की अठखेलियों का जवाब देते
तुम्हारे चेहरे को ढक देते है
बाॅंहें फैलाते, चिल्लाते दौड़ पडूॅंगी
बेशर्म बनकर लिपट जाऊॅंगी
तुम्हारे सीने पर सर रखकर रो पडूॅंगी
बालों में ऊॅंगलियाॅं घुमाते
पलकों से पलकें मिलाकर
लबों से लबों का युग्मन रचूॅंगी
हलक में अटकी गुफ़्तगू को स्वतंत्र करते
रात भर तुमसे बतियाऊॅंगी
कह देती हूॅं हाॅं..
न सोऊॅंगी न दूॅंगी सोने
साल भर की तपस्या का सिला पूरा लूॅंगी
पैर के अंगूठे ने शोर मचाया है
इस बार पिंडलियों को नहीं
अंगूठे को चूमना वहाॅं से एक नस
सीधी उर तक जाती है
जहाॅं बसेरा चूमने वाले का है
अरे..! ये क्या? शिप्रा सूख रही है
पैर लुढ़क रहा है
लाल फूल मुरझा रहा है
अंगूठा निढ़ाल होते सिकुड़ रहा है
कमर में ठूंसा पल्लू चूभ रहा है
अल्ता पिघल रहा है
शाम ने अपना साम्राज्य समेट लिया है
रात के तमस ने मेरे वजूद को
अपनी गिरफ़्त में कर लिया है
आज का दिन तो खास था बहुत खास
ये भी आम होते निकल गया है
और तो क्या बोलूॅं
एक साल से अध्धर ताल झुलता पैर
आहिस्ता-आहिस्ता ज़मीन से जुड़ रहा है।
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रुख़सत के वक्त
Nov 11, 2025
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