काव्य पुस्तक
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संधि मंज़ूर है क्या
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ओ मेरे रीते समुन्दर सुनो न...
दुनिया कहती है हम दोनों के बीच कुछ तो है
चलो एक संधि कर लेते है
पानी की सतह पर लिखी तथाकथित प्रेम कहानी को
हम और तुम मिलकर सच मे जी लेते है
तुम थोड़ा सा नदी का पानी ले आना
मैं मुट्...
दुनिया कहती है हम दोनों के बीच कुछ तो है
चलो एक संधि कर लेते है
पानी की सतह पर लिखी तथाकथित प्रेम कहानी को
हम और तुम मिलकर सच मे जी लेते है
तुम थोड़ा सा नदी का पानी ले आना
मैं मुट्...
Storyline
ओ मेरे रीते समुन्दर सुनो न...
दुनिया कहती है हम दोनों के बीच कुछ तो है
चलो एक संधि कर लेते है
पानी की सतह पर लिखी तथाकथित प्रेम कहानी को
हम और तुम मिलकर सच मे जी लेते है
तुम थोड़ा सा नदी का पानी ले आना
मैं मुट्ठीभर मंदिर के पिछवाड़े की मिट्टी ले आऊँगी
छोटा सा आलोक तो रचना होगा न?
सुनों पारदर्शी पर्दे मेरी पसंद के होंगे
तुम अपनी पसंद का पारिजात आँगन में लगा लेना
और हाँ कभी नम हो जाए नैन मेरे
और गाल गीले हो जाए
पलकों पर मेरी अपनी पलकें रखकर
लबों से पी लेना।
जग जानता है बातूनी हूँ बहुत बातूनी मैं
हाँ लेकिन तुम कभी पकना मत
सीधा मेरे लबों पर अपनी ऊँगली रखकर
आँखें मेरी पढ़ लेना,
अरे हाँ.! सीखना होगा तुम्हें हुनर मनाने का
थोड़ी नखचढ़ी भी तो हूँ न...
बात-बात पर रूठना मेरी फ़ितरत ठहरी
अजी..तुम बस शाम की गुफ़्तगू का समय बढ़ा देना
आसमान से पूछना गलतियाँ अपनी
मैं कुछ नहीं बताऊँगी हाँ
चलता रहे जब खेल रूठने मनाने का दरमियाँ
लंबा बहुत लंबा
तुम बस जान बुझकर हार जाना,
मेरी रीस को अपनी चाहत का वैभव देकर
मुझे धनवान बना देना।
उन्मुक्त है मेरे सपने अंगड़ाई लेकर कभी भी उठे
गलने मत देना, बस एक रंग भर देना आसमानी
अपनी अदाओं का
तुम्हारी बादामी आँखों की कसम
मैं तुम्हारी मुस्कान बन जाऊँगी
मर मिटूँगी तुम्हारे अटूट स्नेह की आग पर
मोहाँध है मेरे स्पंदन
उम्र का आख़री पड़ाव होगा जब, तब
छत पर बिछी खटिया पर सोकर गगन को तकते
तीज की रात से पूछेंगे हमदोनों मिलकर
क्या सफ़ल रही हमारी प्रेम गाथा?
तुम देखना घुमड़ कर एक बादल मेहमाँ बन आएगा
बिछौने पर बिछी दो काया पर
जमकर बरस जाएगा
वो बारिश नहीं आशीष देवताओं का होगा
मेरी तर्जनी से जोड़कर अपनी अनामिका
तुम मुझे ओढ़ लेना, मैं तुम्हें पहनकर तुम बन जाऊँगी
उसी पल शायद दो साँसें एक साथ थम जाएगी
अनंत की डगर पर चलते एक प्रेम कहानी
पीछे अपनी खूबसूरत छाप छोड़ जाएगी।
बोलो न..संधि मंज़ूर है क्या??
दुनिया कहती है हम दोनों के बीच कुछ तो है
चलो एक संधि कर लेते है
पानी की सतह पर लिखी तथाकथित प्रेम कहानी को
हम और तुम मिलकर सच मे जी लेते है
तुम थोड़ा सा नदी का पानी ले आना
मैं मुट्ठीभर मंदिर के पिछवाड़े की मिट्टी ले आऊँगी
छोटा सा आलोक तो रचना होगा न?
सुनों पारदर्शी पर्दे मेरी पसंद के होंगे
तुम अपनी पसंद का पारिजात आँगन में लगा लेना
और हाँ कभी नम हो जाए नैन मेरे
और गाल गीले हो जाए
पलकों पर मेरी अपनी पलकें रखकर
लबों से पी लेना।
जग जानता है बातूनी हूँ बहुत बातूनी मैं
हाँ लेकिन तुम कभी पकना मत
सीधा मेरे लबों पर अपनी ऊँगली रखकर
आँखें मेरी पढ़ लेना,
अरे हाँ.! सीखना होगा तुम्हें हुनर मनाने का
थोड़ी नखचढ़ी भी तो हूँ न...
बात-बात पर रूठना मेरी फ़ितरत ठहरी
अजी..तुम बस शाम की गुफ़्तगू का समय बढ़ा देना
आसमान से पूछना गलतियाँ अपनी
मैं कुछ नहीं बताऊँगी हाँ
चलता रहे जब खेल रूठने मनाने का दरमियाँ
लंबा बहुत लंबा
तुम बस जान बुझकर हार जाना,
मेरी रीस को अपनी चाहत का वैभव देकर
मुझे धनवान बना देना।
उन्मुक्त है मेरे सपने अंगड़ाई लेकर कभी भी उठे
गलने मत देना, बस एक रंग भर देना आसमानी
अपनी अदाओं का
तुम्हारी बादामी आँखों की कसम
मैं तुम्हारी मुस्कान बन जाऊँगी
मर मिटूँगी तुम्हारे अटूट स्नेह की आग पर
मोहाँध है मेरे स्पंदन
उम्र का आख़री पड़ाव होगा जब, तब
छत पर बिछी खटिया पर सोकर गगन को तकते
तीज की रात से पूछेंगे हमदोनों मिलकर
क्या सफ़ल रही हमारी प्रेम गाथा?
तुम देखना घुमड़ कर एक बादल मेहमाँ बन आएगा
बिछौने पर बिछी दो काया पर
जमकर बरस जाएगा
वो बारिश नहीं आशीष देवताओं का होगा
मेरी तर्जनी से जोड़कर अपनी अनामिका
तुम मुझे ओढ़ लेना, मैं तुम्हें पहनकर तुम बन जाऊँगी
उसी पल शायद दो साँसें एक साथ थम जाएगी
अनंत की डगर पर चलते एक प्रेम कहानी
पीछे अपनी खूबसूरत छाप छोड़ जाएगी।
बोलो न..संधि मंज़ूर है क्या??
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संधि मंज़ूर है क्या
Nov 11, 2025
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