काव्य पुस्तक
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चालीस पार वाली शुभांगी
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संदली साँसों वाली
ए चालीस पार की शुभांगी
तेरी त्वचा की मखमली रौनक
गुमराह करती है मेरे लक्ष्य को
कैसे बिठाऊँ सामंजस्य
सांसारिक क्रियाओं से?
क्या तुम जानती हो..
मेरी पुतलियों को चकित करते
मेरे मानस में अनुरा...
ए चालीस पार की शुभांगी
तेरी त्वचा की मखमली रौनक
गुमराह करती है मेरे लक्ष्य को
कैसे बिठाऊँ सामंजस्य
सांसारिक क्रियाओं से?
क्या तुम जानती हो..
मेरी पुतलियों को चकित करते
मेरे मानस में अनुरा...
Storyline
संदली साँसों वाली
ए चालीस पार की शुभांगी
तेरी त्वचा की मखमली रौनक
गुमराह करती है मेरे लक्ष्य को
कैसे बिठाऊँ सामंजस्य
सांसारिक क्रियाओं से?
क्या तुम जानती हो..
मेरी पुतलियों को चकित करते
मेरे मानस में अनुराग भर रही है
तेरी आँखों से बहती सुमधुर रागा
ऐसे, जैसे सांझ को रंगीनियों में बदलती है
अक्सर ढ़लते आदित की
मनोरम्य आभा।
रात की भाषा हो, या हो कोई प्रेम कविता?
चाहे तो कोई कवि तुम्हारी आँखों की
वर्णमाला से कतरे चुराकर
रच दे कोई अनमोल सी रचना।
तुम्हारी मुस्कान की परिधी में
व्याप्त है मोक्ष का आलय
दिल ख़्वाहिश करता है
शैवाल सी मुलायम हथेलियों को
लबों से चूमकर आत्मा की खोज कर लूँ,
जैसे रात होते ही फूलों की पंखुड़ियों में
कैद होता है कोई आवारा भँवरा
वैसे ही तुम्हारे गेसूओं की आगोश में खोते
ज़िन्दगी को जश्न सी जिऊँ
फिर उस रात की कभी सुबह न चाहूँ
ए मेरी ज़रूरत सुनो न...
रख लो न मुझे काम पर,
तुम्हारी खिदमत में हर अंग को वर्णित करते
रोज़ की चार कविता सुनाया करूँगा
ये अहसान कर दो
मेरी ज़िन्दगी जानेगी कोई मीठा स्वाद।
ए चालीस पार की शुभांगी
तेरी त्वचा की मखमली रौनक
गुमराह करती है मेरे लक्ष्य को
कैसे बिठाऊँ सामंजस्य
सांसारिक क्रियाओं से?
क्या तुम जानती हो..
मेरी पुतलियों को चकित करते
मेरे मानस में अनुराग भर रही है
तेरी आँखों से बहती सुमधुर रागा
ऐसे, जैसे सांझ को रंगीनियों में बदलती है
अक्सर ढ़लते आदित की
मनोरम्य आभा।
रात की भाषा हो, या हो कोई प्रेम कविता?
चाहे तो कोई कवि तुम्हारी आँखों की
वर्णमाला से कतरे चुराकर
रच दे कोई अनमोल सी रचना।
तुम्हारी मुस्कान की परिधी में
व्याप्त है मोक्ष का आलय
दिल ख़्वाहिश करता है
शैवाल सी मुलायम हथेलियों को
लबों से चूमकर आत्मा की खोज कर लूँ,
जैसे रात होते ही फूलों की पंखुड़ियों में
कैद होता है कोई आवारा भँवरा
वैसे ही तुम्हारे गेसूओं की आगोश में खोते
ज़िन्दगी को जश्न सी जिऊँ
फिर उस रात की कभी सुबह न चाहूँ
ए मेरी ज़रूरत सुनो न...
रख लो न मुझे काम पर,
तुम्हारी खिदमत में हर अंग को वर्णित करते
रोज़ की चार कविता सुनाया करूँगा
ये अहसान कर दो
मेरी ज़िन्दगी जानेगी कोई मीठा स्वाद।
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चालीस पार वाली शुभांगी
Nov 11, 2025
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