काव्य पुस्तक
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एक और स्त्री
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उन्मुक्त सी अभियुक्त मुझसे भी अनजान
मेरी प्रकृति से परे बेहद मुखर मिजाज़ वाली
एक और स्त्री मेरे भीतर भ्रमण करती है
चुपके चुपके मखमली बिस्तर पर सोकर
ख़्वाबगाह में सैंकड़ो सपने सजाती है
अन्वेषणा हरगिज़ नहीं जॅंचत...
मेरी प्रकृति से परे बेहद मुखर मिजाज़ वाली
एक और स्त्री मेरे भीतर भ्रमण करती है
चुपके चुपके मखमली बिस्तर पर सोकर
ख़्वाबगाह में सैंकड़ो सपने सजाती है
अन्वेषणा हरगिज़ नहीं जॅंचत...
Storyline
उन्मुक्त सी अभियुक्त मुझसे भी अनजान
मेरी प्रकृति से परे बेहद मुखर मिजाज़ वाली
एक और स्त्री मेरे भीतर भ्रमण करती है
चुपके चुपके मखमली बिस्तर पर सोकर
ख़्वाबगाह में सैंकड़ो सपने सजाती है
अन्वेषणा हरगिज़ नहीं जॅंचती उसको
आनंद की अनुरागी हरदम ग़ज़लें गुनगुनाती है,
बजता है संगीत कहीं तो साथ-साथ वो गाती है
उपर से नर्तन करते हर मिसरे पर ठुमके लगाती है
बौराई नहीं रहती, न हीं सुगबुगाहट सहती है
आव-ताव में आकर वाक् बाणों से लड़ती है
सुनती नहीं किसीकी अपने हर्फ़ो से बेध देती है,
श्रृंगार किए वो रहती है हर फ़ैशन उसे लुभाती है
झट से बटुआ खोलती मोल-भाव नहीं करती है
भूतकाल को यूॅं भूलाकर वर्तमान में जीती है
अनागत की व्यंजनाओं को जेब में रखकर घूमती है
बला की बेख़ौफ़ वो बाला निडरता की मूरत है
भय के माहौल में भी निर्भीक भैरवी छेड़ जाती है,
आता नहीं शर्माना उसको पंख फैलाए उड़ती है
दायरा न दस्तूर उसके हर बंदिशें तोड़ देती है
ज़िन्दगी को जश्न समझते मन मर्ज़ी की करती है
मलाल एक रहता है मुझको मेरे भीतर की मर्दानी
कितना भी मनुहार करूॅं वो बाहर नहीं निकलती है।
मेरी प्रकृति से परे बेहद मुखर मिजाज़ वाली
एक और स्त्री मेरे भीतर भ्रमण करती है
चुपके चुपके मखमली बिस्तर पर सोकर
ख़्वाबगाह में सैंकड़ो सपने सजाती है
अन्वेषणा हरगिज़ नहीं जॅंचती उसको
आनंद की अनुरागी हरदम ग़ज़लें गुनगुनाती है,
बजता है संगीत कहीं तो साथ-साथ वो गाती है
उपर से नर्तन करते हर मिसरे पर ठुमके लगाती है
बौराई नहीं रहती, न हीं सुगबुगाहट सहती है
आव-ताव में आकर वाक् बाणों से लड़ती है
सुनती नहीं किसीकी अपने हर्फ़ो से बेध देती है,
श्रृंगार किए वो रहती है हर फ़ैशन उसे लुभाती है
झट से बटुआ खोलती मोल-भाव नहीं करती है
भूतकाल को यूॅं भूलाकर वर्तमान में जीती है
अनागत की व्यंजनाओं को जेब में रखकर घूमती है
बला की बेख़ौफ़ वो बाला निडरता की मूरत है
भय के माहौल में भी निर्भीक भैरवी छेड़ जाती है,
आता नहीं शर्माना उसको पंख फैलाए उड़ती है
दायरा न दस्तूर उसके हर बंदिशें तोड़ देती है
ज़िन्दगी को जश्न समझते मन मर्ज़ी की करती है
मलाल एक रहता है मुझको मेरे भीतर की मर्दानी
कितना भी मनुहार करूॅं वो बाहर नहीं निकलती है।
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एक और स्त्री
Nov 11, 2025
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