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कहकशाँ
काव्य पुस्तक
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कहकशाँ

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कहकशां हो या बाग ए बहार
तुम्हारा ज़िक्र कहीं भी हो
हवाओं में खुश्बू और
फ़िजा़ओं में इत्र घोल देता है
महक उठती है कायनात
फैलते ही लब तुम्हारे
हॅंसी बिखर जाती है
जिसकी खनक के आगे सारे सूर
फ़िके पड़ जाते है
क...
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Storyline

कहकशां हो या बाग ए बहार
तुम्हारा ज़िक्र कहीं भी हो
हवाओं में खुश्बू और
फ़िजा़ओं में इत्र घोल देता है
महक उठती है कायनात
फैलते ही लब तुम्हारे
हॅंसी बिखर जाती है
जिसकी खनक के आगे सारे सूर
फ़िके पड़ जाते है
क्या चबाती हो जानाॅं जो तुम्हारी
साॅंसों की महक के आगे
मोगरा लज्जाते खुदकुशी कर लेता है
नृत्य की परिभाषा हो या
नग्मों का आगाज़
पलकें उठते ही ठहरा वक्त चल देता है
ताज सी सुंदर हसीना
देखकर तुम्हारे जलवों के ठाट
उदासियो में रंगीनियां छा जाती है
गुलों के गात्रो से उर्जा चुरा लाती हो
या चाॅंद के नूर में नहाकर आती हो
कहो कौन हो इस जहाॅं की हो या
आसमाॅं से उतरकर आई हो
तुम्हारी ओरा को अर्श समझते
इबादत में हाथ उठा लेते है औलिये
नमाज़ी नतमस्तक बन जाते हैं।

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कहकशाँ
Nov 11, 2025
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