काव्य पुस्तक
काव्य पुस्तक
ज़रा अदब से
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(1 Reviews)
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औरतें चाहे चालीस पार की हो या पचास
तरुणावस्था की दहलीज़ लांघती ही नहीं
नखशिख चंचलता भरे हर लम्हों को
जी भरकर जीना जानती है
स्वाद होता है इनकी हर अदाओं में
आशाओं की कबरी नहीं बांधती
खुले केश की भांति आज़ाद छ...
तरुणावस्था की दहलीज़ लांघती ही नहीं
नखशिख चंचलता भरे हर लम्हों को
जी भरकर जीना जानती है
स्वाद होता है इनकी हर अदाओं में
आशाओं की कबरी नहीं बांधती
खुले केश की भांति आज़ाद छ...
Storyline
औरतें चाहे चालीस पार की हो या पचास
तरुणावस्था की दहलीज़ लांघती ही नहीं
नखशिख चंचलता भरे हर लम्हों को
जी भरकर जीना जानती है
स्वाद होता है इनकी हर अदाओं में
आशाओं की कबरी नहीं बांधती
खुले केश की भांति आज़ाद छोड़ देती है
अपने हर शौक़ की गठरी।
हलक में हरगिज़ नहीं रखती चित्कार
गुफ़्तगु का हुनर रखते परोस देती है एक-एक विचार
प्रणय को रिवाज़ो के दायरे में कैद नहीं रखती
कर लेती है एक से ज़्यादा बार इश्क का आगाज़
रिश्तों का गूंफ़न कुछ यूं करती है
सहजकर अपनी परवाज़ में अपनों को
हर चेहरे पर हंसी मलना बखूबी जानती है।
मस्ती का महालय होती है चालीस पार की औरतें
तज़ुर्बे को पीठ पर लादें हर हद पार कर जाती है
विद्यमान करते गरिमा अपने वजूद में
किसी भी क्षेत्र में खुद को प्रस्थापित करने से नहीं घबराती
उम्र की अठखेलियों से खेलते
भीतर से खुद को पच्चीस की महसूस करती है।
विराट शख़्शियत होती है स्त्री अपने आप में
दमन के दलदल में वजूद को धंसता देख
प्रतिकार की प्रत्यंचा खींचने से बिल्कुल नहीं डरती है
चालीस पार की औरतों को बुढ़ापे की गर्त में गिरती
कमज़ोर कायावान मत समझो
ज़रा अदब से पेश आना।
उम्र के साथ तेज़ होते शमशीर की धार सी
कातिल कटार सी बन जाती है ये चालीस पार की औरतें।
तरुणावस्था की दहलीज़ लांघती ही नहीं
नखशिख चंचलता भरे हर लम्हों को
जी भरकर जीना जानती है
स्वाद होता है इनकी हर अदाओं में
आशाओं की कबरी नहीं बांधती
खुले केश की भांति आज़ाद छोड़ देती है
अपने हर शौक़ की गठरी।
हलक में हरगिज़ नहीं रखती चित्कार
गुफ़्तगु का हुनर रखते परोस देती है एक-एक विचार
प्रणय को रिवाज़ो के दायरे में कैद नहीं रखती
कर लेती है एक से ज़्यादा बार इश्क का आगाज़
रिश्तों का गूंफ़न कुछ यूं करती है
सहजकर अपनी परवाज़ में अपनों को
हर चेहरे पर हंसी मलना बखूबी जानती है।
मस्ती का महालय होती है चालीस पार की औरतें
तज़ुर्बे को पीठ पर लादें हर हद पार कर जाती है
विद्यमान करते गरिमा अपने वजूद में
किसी भी क्षेत्र में खुद को प्रस्थापित करने से नहीं घबराती
उम्र की अठखेलियों से खेलते
भीतर से खुद को पच्चीस की महसूस करती है।
विराट शख़्शियत होती है स्त्री अपने आप में
दमन के दलदल में वजूद को धंसता देख
प्रतिकार की प्रत्यंचा खींचने से बिल्कुल नहीं डरती है
चालीस पार की औरतों को बुढ़ापे की गर्त में गिरती
कमज़ोर कायावान मत समझो
ज़रा अदब से पेश आना।
उम्र के साथ तेज़ होते शमशीर की धार सी
कातिल कटार सी बन जाती है ये चालीस पार की औरतें।
What Readers Say
View AllAkash ydv Dev💞
7 months ago
अच्छा लिक्खा है
❤ 0
ज़रा अदब से
All Chapters (1)
Chapter 0
ज़रा अदब से
Nov 11, 2025
Read
Akash ydv Dev💞
अच्छा लिक्खा है
7 months ago
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